भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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  • ९३ ] अविचारी कृत्यसे अनुताप होना २५१ अपरं च,— एकदा न विगृह्णीयाद्बहून् राजाभिघातिनः । सदर्पोऽप्युरगः कीटैर्बहुभिर्नाश्यते ध्रुवम् ॥ ९२ ॥ और दूसरे-राजा एकही समय पर बहुतसे शत्रुओंसे नहीं लड़े; क्योंकि, अहंकारी सर्पकोभी निश्चय करके बहुतसी (क्षुद्र) चीटियां मार डालती हैं ॥९२॥ देव ! किमिति विना संधानं गमनमस्ति ? यतस्तदास्तत्पश्चात्प्र- कोपोऽनेन कर्तव्यः । हे महाराज ! बिना मेल किये कैसे जाते हो ? क्योंकि फिर हमारे जानेके बाद यह बड़ा कोप करेगा. अपरं च,— योऽर्थतत्त्वमविज्ञाय क्रोधस्यैव वशं गतः । स तथा तप्यते मूढो ब्राह्मणो नकुलाद्यथा' ॥ ९३ ॥ और दूसरे-जो मूर्ख मनुष्य बातके भेदको न जान कर केवल क्रोधकेही वश हो जाता है वह वैसाही दुःख पाता है जैसा नेवलेसे ब्राह्मण दुःखी हुआ' ॥ ९३ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । दूरदर्शी कथयति— राजा बोला-‘यह कथा कैसी है ? दूरदर्शी कहने लगा ।— कथा १३ [ माधव ब्राह्मण, उसका बालक, नेवला और साँपकी कहानी १३ ] ‘अस्त्युज्जयिन्यां माधवो नाम विप्रः । तस्य ब्राह्मणी प्रसूत- बालापत्यस्य रक्षार्थं ब्राह्मणमवस्थाप्य स्नातुं गता । अथ ब्राह्म- णाय राज्ञः पार्वणश्राद्धं दातुमाह्वानमागतम् । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणः सहजदारिद्र्यादचिन्तयत्—'यदि सत्वरं न गच्छामि तदाऽन्यः कश्चिच्छ्रुत्वा श्राद्धं ग्रहीष्यति । ‘उज्जयिनी नगरीमें माधव नाम ब्राह्मण रहता था । उसकी ब्राह्मणीके एक बालक हुआ । वह उस बालककी रक्षाके लिये ब्राह्मणको बैठा कर नहानेके लिये