भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

राजा बोला-‘इस उत्तर प्रत्युत्तरको रहने दो। जो करना है सो कीजिये.’ यह परामर्श करके महामंत्री गिद्ध “इसमें जो उचित होगा, सो किया जायगा” यह कह कर गढ़के अंदर चला गया। फिर दूत बगुलेने आ कर राजा हिरण्यगर्भसे निवेदन किया कि ‘महाराज ! महामंत्री गिद्ध हमारे पास मेल करनेके लिये आया है.’ राजहंसने कहा-‘हे मंत्री ! फिर किसी न किसी संबन्धसे यहां आया होगा.’ सर्वज्ञ हँस कर बोला-‘महाराज ! यह शंकाका स्थान नहीं है. क्योंकि यह दूरदर्शी बड़ा सज्जन है। अथवा ऐसा मन्दबुद्धियोंका नियम है कि कभी तो शंका नहीं करते हैं, कभी सर्वत्र शंका करते हैं। तथा हि,— सरसि बहुशस्ताराच्छाया क्षणात्परिवञ्चितः कुमुदविटपान्वेषी हंसो निशास्वविचक्षणः । न दशति पुनस्ताराशङ्की दिवापि सितोत्पलं कुहकचकितो लोकः सत्येऽप्यपायमपेक्षते ॥ १०१ ॥ कुमुदिनीको ढूंढने वाला चतुर हंस रातको सरोवरमें बहुतसे तारोंकी परछा- ईसे क्षणभर ठगा हुआ (अर्थात् तारोंकी परछाईको कुमुदिनी जान कर) दिनमेंभी तारोंकी शंकासे फिर श्वेतकमलोंको नहीं लेता है, जैसे छलसे छला गया संसार सत्यमेंभी बुराईकी शंका करता है ॥ १०१ ॥ दुर्जनदूषितमनसः सुजनेष्वपि नास्ति विश्वासः । बालः पायसदग्धो दध्यपि फूत्कृत्य भक्षयति ॥ १०२ ॥ दुष्टोंसे छले हुए चित्त वाले मनुष्यका सज्जनोंमेंभी विश्वास नहीं रहता है जैसे क्षीरसे जला हुआ बालक दहीकोभी सचमुच फूंक देकर कर खाता है ॥ १०२ ॥ तद्देव ! यथाशक्ति तत्पूजार्थं रत्नोपहारादिसामग्री सुसज्जीक्रिय- ताम्।’ तथानुष्ठिते सति स गृध्रो मन्त्री दुर्गद्वाराच्चक्रवाकेणोप- गम्य सत्कृत्यानीय राजदर्शनं कारितो दत्तासने चोपविष्टः । चक्र- वाक उवाच—‘युष्मदायत्तं सर्वम् । स्वेच्छयोपभुज्यतामिदं राज्यम्।’ राजहंसो ब्रूते—‘एवमेव।’ दूरदर्शी कथयति—‘एव- मेवैतत् । किंत्विदानीं बहुप्रपञ्चवचनं निष्प्रयोजनम् ।

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 275, कुल 302 में से · BharatKosha