हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२५८ हितोपदेशः [संधिः ११२- संगतः संधिरेवायं प्रकृष्टत्वात् सुवर्णवत् । तथाऽन्यैः संधिकुशलैः काञ्चनः स उदाहृतः ॥ ११२ ॥ वह संगतसंधि परमोत्तम होनेसे सुवर्णके समान है और दूसरे संधि जानने वालोंने इसको “कांचनसंधि” कही है, अर्थात् सुवर्णके समान, नम भलेही जाय परन्तु टूटती नहीं है ॥ ११२ ॥ आत्मकार्यस्य सिद्धिं तु समुद्दिश्य क्रियेत यः । स उपन्यासकुशलैरुपन्यास उदाहृतः ॥ ११३ ॥ अपना काम निकालनेके अभिप्रायसे जो की जाती है, उसे नीति जानने वाले “उपन्याससंधि” कहते हैं ॥ ११३ ॥ मयाऽस्योपकृतं पूर्वं ममाप्येष करिष्यति । इति यः क्रियते संधिः प्रतीकारः स उच्यते ॥ ११४ ॥ मैंने पहले इसका उपकार किया है, यहभी भविष्यमें मेरे ऊपर उपकार करेगा; इस हेतुसे जो संधि की जाती है उसे “प्रतीकारसंधि” कहते हैं ॥ ११४ ॥ उपकारं करोम्यस्य ममाप्येष करिष्यति । अयं चाऽपि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोरिव ॥ ११५ ॥ और मैं इसका उपकार करता हूं यहभी मेरा करेगा यहभी दूसरे प्रकारकी राम-सुग्रीव जैसी “प्रतीकारसंधि” है ॥ ११५ ॥ एकार्थं सम्यगुद्दिश्य क्रियां यत्र हि गच्छति । सुसंहितप्रमाणस्तु स च संयोग उच्यते ॥ ११६ ॥ जहां एकही प्रयोजनके करनेके लिये दृढ प्रमाणोंसे युक्त संधि होती है, उसको “संयोगसंधि” कहते हैं ॥ ११६ ॥ आवयोर्योधमुख्यैस्तु मदर्थः साध्यतामिति । यस्मिन्पणस्तु क्रियते स संधिः पुरुषान्तरः ॥ ११७ ॥ हम दोनोंके मुख्य योद्धा लोग हमारा कार्यसाधन करे; ऐसी जिसमें प्रतिज्ञा की जाती है वह “पुरुषांतरसंधि” है ॥ ११७ ॥ त्वयैकेन मदीयोऽर्थः संप्रसाध्यस्त्वसाविति । यत्र शत्रुः पणं कुर्यात् सोऽदृष्टपुरुषः स्मृतः ॥ ११८ ॥ और केवल तुझेही मेरे कामको अच्छी तरह कर देना चाहिये; ऐसी प्रतिज्ञा जिस संधिमें शत्रु करे उसे “अदृष्टपुरुषसंधि” कहते हैं ॥ ११८ ॥