भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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२४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ३८- अथ लुब्धकं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोता ऊचुः—'किमिदानीं कर्तु- मुचितम् ?' । चित्रग्रीव उवाच— पीछे उस लोभीको लौटता देख कर कबूतर बोले कि—'अब क्या करना चाहिये ?'. चित्रग्रीव बोला— 'माता मित्रं पिता चेति स्वभावात्रितयं हितम् । कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः ॥ ३८ ॥ 'माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभावसे हितकारी होते हैं, और दूसरे (लोग) कार्य और किसी कारणसे हितकी इच्छा करने वाले होते हैं ॥ ३८ ॥ तदस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजो गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति, सोऽस्माकं पाशांश्छेत्स्यति ।' इत्यालोच्य सर्वे हिरण्यक- विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदाऽपायशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतावपातभयाच्चकित- स्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच—'सखे हिरण्यक ! किमस्मान्न संभाषसे ?' । ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय ससंभ्रमं बहि- र्निःसृत्याब्रवीत्—'आः, पुण्यवानस्मि । प्रियसूहन्मे चित्रग्रीवः समायातः । इसलिये मेरा मित्र हिरण्यक नाम चूहोंका राजा गंडकी नदीके तीर पर चित्र- वनमें रहता है, वह हमारे फंदोंको काटेगा । यह विचार कर सब हिरण्यकके बिलके पास गये । हिरण्यक सदा आपत्ति आनेकी आशंकासे अपना बिल सौ द्वारका बना कर रहता था । फिर हिरण्यक कबूतरोंके उतरनेकी आहटसे डर कर चुपकेसे बैठ गया । चित्रग्रीव बोला—'हे मित्र हिरण्यक ! हमसे क्यों नहीं बोलते हो ?'. फिर हिरण्यक उसका बोल पहिचान कर शीघ्रतासे बाहर निकल कर बोला—'अहा ! में बड़ा पुण्यवान् हूं कि मेरा प्यारा मित्र चित्रग्रीव आया । यस्य मित्रेण संभाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः । यस्य मित्रेण संलापस्ततो नास्तीह पुण्यवान्' ॥ ३९ ॥ जिसकी मित्रके साथ बोल-चाल है, जिसका मित्रके साथ रहना-सहना हो, और जिसकी मित्रके साथ गुप्त बात-चीत हो, उसके समान कोई इस संसारमें पुण्यवान् नहीं है' ॥ ३९ ॥