भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

-१०१ ] मैत्रीपथमें कौवेकी सफलता ४५ तथा चोक्तम्,- घर्मार्तं न तथा सुशीतलजलैः स्नानं न मुक्तावली न श्रीखण्डविलेपनं सुखयति प्रत्यङ्गमप्यर्पितम् । प्रीत्या सज्जनभाषितं प्रभवति प्रायो यथा चेतसः सद्युक्त्या च पुरस्कृतं सुकृतिनामाकृष्टिमन्त्रोपमम् ॥ ९७ ॥ जैसा कहा है कि-सुन्दर २ युक्तियोंसे शोभायमान, पुण्यात्माओंके आकर्षण मंत्रके समान प्रीतिसे कहा हुआ सज्जनोंका वचन जैसा चित्तको अत्यन्त सुख- कारी होता है वैसा शीतल जलसे स्नान, मोतियोंकी माला और अंगअंगमें लगा हुआ लेपन किया हुआ चंदन भी धूपके सताये हुएको सुख नहीं देता है ॥९७॥ अन्यच्च,- रहस्यभेदो याञ्ज्ञा च नैष्ठुर्यं चलचित्तता । क्रोधो निःसत्यता द्यूतमेतन्मित्रस्य दूषणम् ॥ ९८ ॥ और दूसरे-गुप्त बातको प्रकट करना, धन आदिकी याचना, कठोरता, चित्तकी चंचलता, क्रोध, झूठ और जुआ, ये मित्रके दूषण हैं ॥ ९८ ॥ अनेन वचनक्रमेण तदेकमपि दूषणं त्वयि न लक्ष्यते । सो तुम्हारी बातोंके ढंगसे उनमेंसे एकभी दोष तुममें नहीं दीखता है. यतः,- पटुत्वं सत्यवादित्वं कथायोगेन बुध्यते । अस्तब्धत्वमचापल्यं प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥ ९९ ॥ क्योंकि-चातुर्य और सत्य यह बातचीतसे जान लिये जाते हैं, और नम्रता और शांतता ये प्रत्यक्ष जानी जाती हैं ॥ ९९ ॥ अपरं च,- अन्यथैव हि सौहार्दं भवेत्स्वच्छान्तरात्मनः । प्रवर्ततेऽन्यथा वाणी शाठ्योपहतचेतसः ॥ १०० ॥ और दूसरे-निष्कपट चित्त वालेकी मित्रता अन्यही तरहकी होती है और जिसका हृदय शठतासे बिगड़ रहा है उसकी वाणी औरही प्रकारकी होती है ॥ मनस्यन्यद्वचस्यन्यत् कार्यमन्यद्दुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ॥ १०१ ॥

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 65, कुल 302 में से · BharatKosha