भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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ष्टितचेतसा धनदर्पल्लीलावती नाम वणिक्पुत्री परिणीता। सा च मकरकेतोर्विजयवैजयन्तीव यौवनवती बभूव । स च वृद्धपति- स्तस्याः संतोषाय नाभवत् । बंगाल देशमें कौशाम्बी नाम एक नगरी है । उसमें चन्दनदास नाम एक बड़ा धनवान् बनिया रहता था । उसने बुढ़ापेमें कामातुर हो कर धनके मदसे लीलावती नाम एक बनियेकी बेटीसे विवाह कर लिया । वह लीलावती काम- देवकी विजयपताकाके समान तारुण्यतरङ्गिता हुई. पर वह बूढ़ा पति उसके संतोष करनेके लिये योग्य नहीं था । यतः,— शशिनीव हिमार्तानां घर्मार्तानां रवाविव । मनो न रमते स्त्रीणां जराजीर्णेन्द्रिये पत्यौ ॥ ११० ॥ क्योंकि—जैसे पालेसे मरे हुओंका चित्त चन्द्रमामें, और धूपसे दुःखियों का सूरजमें नहीं लगता है वैसेही स्त्रियोंका मन शिथिल इन्द्रियोंवाले पतिमें नहीं लगता है ॥ ११० ॥ अन्यच्च,— पतितेषु हि दृष्टेषु पुंसः का नाम कामिता ? । भेषज्यमिव मन्यन्ते यदन्यमनसः स्त्रियः ॥ १११ ॥ और दूसरे—जब बाल श्वेत हो गये तब पुरुषको कामकी योग्यता कहां ? क्योंकि जिन स्त्रियोंका दिल अन्य पुरुषोंसे लग रहा है वे (ऐसे पतिको) औषधके समान समझती हैं ॥ १११ ॥ स च वृद्धपतिस्तस्यामतीवानुरागवान् । और वह बूढ़ा पति उस पर अत्यंत आसक्त था. यतः,— धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा । वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ११२ ॥ क्योंकि-प्राणधारियोंको धन और जीवनकी बड़ी आशा होती है, लेकिन बूढ़ेको तरुण स्त्री प्राणोंसेभी अधिक प्यारी होती है ॥ ११२ ॥ नोपभोक्तुं न च त्यक्तुं शक्नोति विषयाञ्जरी । अस्थि निर्दशनः श्वेव जिह्वया लेढि केवलम् ॥ ११३ ॥