हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] ५२ हितोपदेशः [मित्रलाभः ११८-
स्त्रियोंका कोई अप्रिय अथवा प्रियभी नहीं है, जैसे वनमें गायें नये नये तृणको चाहती हैं वैसेही स्त्रियें भी नवीन नवीन पुरुषको चाहती हैं ॥११७॥ अपरं च,— घृतकुम्भसमा नारी तप्ताङ्गारसमः पुमान् । तस्माद्घृतं च वह्निं च नैकत्र स्थापयेद्बुधः ॥ ११८ ॥ और,—स्त्री घीके घड़ेके समान है और पुरुष जलते हुये अंगारके समान है, इसलिये बुद्धिमानको चाहिए कि घी और अग्निको पास पास न रखे ॥ ११८ ॥ मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नो विविक्तासनो भवेत् । बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ ११९ ॥ पुरुषको, माता, बहिन और बेटी, इनके पासभी एकांतमें नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि इंद्रियां बड़ी बलवान् हैं, ये जितेन्द्रियकोभी वशमें कर लेती हैं ॥ ११९ ॥ न लज्जा न विनीतत्वं न दाक्षिण्यं न भीरुता । प्रार्थनाभाव एवैकं सतीत्वे कारणं स्त्रियाः ॥ १२० ॥ स्त्रियोंको पतिव्रत रखनेमें न लज्जा, न विनय, न चतुरता और न भय कारण है, परन्तु केवल प्रार्थनाका न होना (अर्थात् परपुरुषसे संभोगकी प्रार्थना न होना) ही एक कारण है ॥ १२० ॥ पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १२१ ॥ बचपनमें पिता, जवानीमें पति, और बुढ़ापेमें पुत्र रक्षा करता है, एवं स्त्रीको कदापि स्वतंत्रता योग्य नहीं है ॥ १२१ ॥ एकदा सा लीलावती रत्नावलीकिरणकर्बुरे पर्यङ्के तेन वणि- क्पुत्रेण सह विश्रम्भालापैः सुखासीना तमलक्षितोपस्थितं पति- मवलोक्य सहसोत्थाय केशेष्वाकृष्य गाढमालिङ्ग्य चुम्बितवती । तेनावसरेण जारश्च पलायितः । एक दिन (पतिकी अनुपस्थितिमें) वह लीलावती रत्नोंकी बाढ़की झलकसे रंगबिरंगे पलंग पर उस बनियेके पुत्रके साथ जी खोल कर बातें करती हुई आनन्दसे बैठी थी इतनेमें अचानक आये हुए उस अपने पतिको देख कर यकायक उठी और बाल पकड़ कर, अत्यन्त चिपट कर उसको चूमने लगी और इस अवसरमें (मौका देख कर) यारभी भाग गया;