हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १३३- जैसा कहा है कि—जब पुरुषार्थही में निष्फलता होने लग जाए और भाग्यकी अत्यन्त प्रतिकूल दशामें धीरज वाले दरिद्री मनुष्यको वनको छोड़ और कहां सुख धरा है ? ( याने उसको स्वस्थान छोड़ कर कहांही वनमें जाना यही उचित है ) ॥ १३२ ॥ अन्यच्च,— मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति । अपि निर्वाणमायाति नानलो याति शीतताम् ॥ १३३ ॥ और दूसरे—उदार पुरुष मर जाय पर कृपणता नहीं करता है ( अपनी लाचारी नहीं बताता है ) जैसे अग्नि भले बुझ जाय, पर ठंडी नही होती है ॥ १३३ ॥ किं च,— कुसुमस्तबकस्येव द्वे वृत्ती तु मनस्विनः । सर्वेषां मूर्ध्नि वा तिष्ठेद्विशीर्येत वनेऽथवा ॥ १३४ ॥ और पुष्पके,-गुच्छेके समान उदार मनुष्यकी दो तरहकी प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे या वनमें कुम्हला जाय ॥ १३४ ॥ यच्चात्रैव याच्ञया जीवनं तदतीव गर्हितम् । और जो यहां याचना कर जीना है वह तो बिलकुल अच्छा नहीं है, यतः— वरं विभवहीनेन प्राणैः संतर्पितोऽनलः । नोपचारपरिभ्रष्टः कृपणः प्रार्थितो जनः ॥ १३५ ॥ क्योंकि—धनहीन मनुष्य प्राणोंको अग्निमें झोंक दे सो अच्छा, परन्तु अपने मानको छोड़ कर कृपण मनुष्यसे याचना करना अच्छा नहीं है ॥ १३५ ॥ दारिद्र्याद्ध्रियमेति ह्रीपरिगतः सत्त्वात्परिभ्रश्यते निःसत्त्वः परिभूयते परिभवान्निर्वेदमापद्यते । निर्विण्णः शुचमेति शोकनिहतो बुद्ध्या परित्यज्यते निर्बुद्धिः क्षयमेत्यहो निधनता सर्वापदामस्पदम् ॥ १३६ ॥ और निर्धनतासे मनुष्यको लज्जा होती है, लज्जासे पराक्रम नष्ट हो जाता है, पराक्रम न होनेसे अपमान होता है, अपमान होनेसे दुःख पाता है, दुःखसे शोक करता है, शोकसे बुद्धिहीन हो जाता है, और बुद्धि न होनेसे नाश हो जाता है । अहो, निर्धनता ही सब आपत्तियोंका स्थान है ॥ १३६ ॥