भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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५८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १४०- यतः,- पल्लवग्राहि पाण्डित्यं क्रयकीतं च मैथुनम् । भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः ॥ १४० ॥ क्योंकि—थोड़ा पढ़ कर पण्डिताई, धन दे कर मैथुन, और पराये आसरेका भोजन, ये तीन बातें मनुष्यकी व्यर्थ हैं ॥ १४० ॥ अपरं च,- रोगी चिरप्रवासी परान्नभोजी परावसथशायी । यज्जीवति तन्मरणं यन्मरणं सोऽस्य विश्रामः' ॥ १४१ ॥ और रोगी, बहुत कालतक विदेशमें रहने वाला, दूसरेके आसरे भोजन करने वाला तथा दूसरेके घर सोने वाला इनका जीना मरणके, और मरण विश्रामके समान है ॥ १४१ ॥ इत्यालोच्यापि लोभात्पुनरप्यर्थं ग्रहीतुं ग्रहमकरवम् । यह सोच करभी लोभसे फिर उसका धन लेनेकी हठ की । यथा चोक्तम्,- लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम् । तृषार्तो दुःखमाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ १४२ ॥ जैसा कहा है—लोभसे बुद्धि चलायमान हो जाती है, लोभही तृष्णाको बढ़ाता है, और तृष्णासे दुःखी हुआ मनुष्य इस लोक और परलोकमें कष्ट पाता है ॥ १४२ ॥ ततोऽहं मन्दं मन्दमुपसर्पंस्तेन वीणाकर्णेन जर्जरवंशखण्डेन ताडितश्चाचिन्तयम्— फिर उस वीणाकर्णने धीरे धीरे मुझ चलते हुएको एक सड़े बांसका टुकड़ा मारा, और मैं चिंता करने लगा— धनलुब्धो ह्यसंतुष्टोऽनियतात्माऽजितेन्द्रियः । सर्वा एवापदस्तस्य यस्य तुष्टं न मानसम् ॥ १४३ ॥ जिसको संतोष नहीं है उसको सब आपत्तियां ही हैं, क्योंकि वह धनका लोभी, अप्रसन्न, दुच्चित्ता और अजितेन्द्री हो जाता है ॥ १४३ ॥ तथा च,- सर्वाः संपत्तयस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् । उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः ॥ १४४ ॥