हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ६२ हितोपदेशः [मित्रलाभः १५८-
और दूसरे—लोभी जिस धनको धरतीमें अधिक नीचे गाड़ता है वह धन पातालमें जानेके लिये पहलेसेही मार्ग कर लेता है ॥ १५७ ॥ अन्यच्च,— निजसौख्यं निरुन्धानो यो धनार्जनमिच्छति । परार्थभारवाहीव क्लेशस्यैव हि भाजनम् ॥ १५८ ॥ और जो मनुष्य अपने सुखको रोक कर धनसंचय करनेकी इच्छा करता है वह दूसरोंके लिये बोझ ढोने वाले(मजदूर)के समान क्लेशही भोगने वाला है १५८ अपरं च,— दानोपभोगहीनेन धनेन धनिनो यदि । भवामः किं न तेनैव धनेन धनिनो वयम् ॥ १५९ ॥ और दूसरे—दान और उपभोगहीन धनसे जो धनी होते हैं तो क्या उसी धनसे हम धनी नहीं हैं ? अर्थात् अवश्य हैं ॥ १५९ ॥ अन्यच्च,— न देवाय न विप्राय न बन्धुभ्यो न चात्मने । कृपणस्य धनं याति वह्नितस्करपार्थिवैः ॥ १६० ॥ और जो मनुष्य धनको देवताके, ब्राह्मणके तथा भाईबन्धुके काममें नहीं लाता है उस कृपणका धन तो जल जाता है या चोर चुरा ले जाते हैं अथवा राजा छीन लेता है ॥ १६० ॥ अपि च,— दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ १६१ ॥ औरभी—दान, भोग और नाश धनकी तीन गति होती हैं; जो न देता है और न खाता है उसकी तीसरी गति होती है, अर्थात् नाश हो जाता है ॥१६१॥ असंभोगेन सामान्यं कृपणस्य धनं परैः । 'अस्येदमिति' संबन्धो हानौ दुःखेन गम्यते ॥ १६२ ॥ औरभी; विनाभोगे कृपणका धन दूसरे मनुष्योंके धनके समान है, परन्तु हानि होने पर, धनीके दुःखी होनेसे 'यह इसका धन है' ऐसा जाना जाता है ॥ १६२ ॥