हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १६६-
अथ तयोः पादास्फालनेन सर्पोऽपि मृतः। अथानन्तरं दीर्घरात्रो नाम जम्बुकः परिभ्रमन्नाहारार्थी तान्मृतान्मृगव्याधसर्पशूकरान- पश्यत्। अचिन्तयच्च — 'अहो ! अद्य महद्भोज्यं मे समुपस्थितम्। उन दोनोंके पैरोंकी रगड़से एक सर्पभी मर गया। इसके पीछे आहारको चाहने वाले दीर्घराव नाम गीदडने घूमते २ उन मृग, व्याध, सर्प और शूकरको मरे पड़े हुए देखा और विचारा कि 'आहा ! आज तो मेरे लिये बड़ा भोजन तैयार है॥ अथवा,— अचिन्तितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनाम् । सुखान्यपि तथा मन्ये दैवमत्रातिरिच्यते ॥ १६६ ॥ अथवा—जैसे देहधारियोंको अनायास दुःख मिलते हैं वैसेही सुखभी मिलते हैं, परन्तु इसमें प्रारब्ध बलवान् है ऐसा मानता हूं ॥ १६६ ॥ तद्भवतु । एषां मांसैर्मासत्रयं मे सुखेन गमिष्यति । जो कुछ हो, इनके मांसोंसे मेरे तीन महीने तो सुखसे कटेंगे । मासमेकं नरो याति द्वौ मासौ मृगशूकरौ । अहिरेकं दिनं याति अद्य भक्ष्यो धनुर्गुणः ॥ १६७ ॥ एक महीनेको मनुष्य होगा, दो महीनेको हरिण और सूकर होंगे और एक दिनको सर्प होगा, और आज धनुषकी डोरी चाबनी चाहिये ॥ १६७॥ ततः प्रथमबुभुक्षायामिदं निःस्वादु कोदण्डलग्नं स्नायुबन्धनं खादामि ।' इत्युक्त्वा तथा कृते सति छिन्ने स्नायुबन्धने उत्पति- तेन धनुषा हृदि निर्भिन्नः स दीर्घरावः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि — “कर्तव्यः संचयो नित्यम्” इत्यादि । फिर पहिली भूखमें यह स्वादरहित, धनुषमें लगा हुआ तांतका बन्धन खाऊं।' यह कह कर वैसा करने पर तांतके बंधनके टूटतेही उछटे हुए धनुषसे हृदय फट कर वह दीर्घराव मर गया । इसलिये मैं कहता हूं “संचय नित्य करना चाहिये” इत्यादि । तथा च,— यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् । अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥ १६८ ॥