भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

-१७९] पराक्रमकी महिमा ६७ अपरं च,— निपानमिव मण्डूकाः सरः पूर्णमिवाण्डजाः । सोद्योगं नरमायान्ति विवशाः सर्वसंपदः ॥ १७६ ॥ और जैसे मैण्डक कूपके पासके पानीके गढ्ढेमें और पक्षी भरे हुए सरोवरको आते हैं, वैसेही सब सम्पत्तियां परवश होकर (अपने आप) उद्योगी पुरुषके पास आती हैं ॥ १७६ ॥ अन्यच्च,— सुखमापतितं सेव्यं दुःखमापतितं तथा । चक्रवत् परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ १७७ ॥ और, आए हुए सुख तथा दुःखको भोगना चाहिये । क्योंकि सुख और दुःख पहियेकी तरह घूमते हैं (याने सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आते जाते हैं) ॥ १७७ ॥ अन्यच्च,— उत्साहसंपन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् । शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः ॥ १७८ ॥ और दूसरे-उत्साही, तथा आलस्यहीन, कार्यकी रीतिको जानने वाला, द्यूतक्रीडा (जूआ) आदि व्यसनसे रहित, शूर, उपकारको मानने वाला और पक्की मित्रता वाला ऐसे पुरुषके पास रहनेके लिये लक्ष्मी आपही जाती है ॥ १७८ ॥ विशेषतश्च,— विनाप्यर्थैर्वीरः स्पृशति बहुमानोन्नतिपदं समायुक्तोऽप्यर्थैः परिभवपदं याति कृपणः । स्वभावादुद्भूतां गुणसमुदयावाप्तिविषयां द्युतिं सैंहीं किं श्वा धृतकनकमालोऽपि लभते ? ॥ १७९ ॥ और विशेष बात यह है कि-वीर पुरुष बिनाही धनके सन्मानसे उच्च पदको पाता है, और कृपण धनयुक्त होनेसेभी तिरस्कार किया जाता है. जैसे कुत्ता