भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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-२०७] गीदडकी चालसे हाथीका फँसना ७७ और दूसरे-राजा प्राणियोंका मेघके समान जीवनका सहारा है और मेघके नहीं बरसनेसे तो लोक जीता रहता है, परन्तु राजाके न होनेसे जी नहीं सकता है ॥ २०५ ॥ नियतविषयवर्ती प्रायशो दण्डयोगा- ज्जगति परवशेऽस्मिन्दुर्लभः साधुवृत्तः । कृशमपि विकलं वा व्याधितं वाऽधनं वा पतिमपि कुलनारी दण्डभीत्याऽभ्युपैति ॥ २०६ ॥ इस परवश (अर्थात् राजाके आधीन) इस संसारमें बहुधा दंडके भयसे लोग अपने नियत कार्योंमें लगे रहते हैं और नहीं तो अच्छे आचरणमें मनु- ष्योंका रहना कठिन है । क्योंकि दंडकेही भयसे कुलकी स्त्री दुबले, विकलांग (अर्थात् लंगड़े लूले) रोगी या निर्धनभी पतिको स्वीकार करती है ॥ २०६ ॥ तद्यथा लग्नवेला न विचलति तथा कृत्वा सत्वरमागम्यतां देवेन' । इत्युक्त्वोत्थाय चलितः । ततोऽसौ राज्यलोभाकृष्टः कर्पूरतिलकः शृगालवर्त्मना धावन्महापङ्के निमग्नः । ततस्तेन हस्तिनोक्तम्— ‘सखे शृगाल ! किमधुना विधेयम् ? पङ्के निपतितोऽहं म्रिये । परावृत्य पश्य' । शृगालेन विहस्योक्तम्-‘देव ! मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वोत्तिष्ठ । यन्मद्विधस्य वचसि त्वया प्रत्ययः कृतस्तदनुभूयता- मशरणं दुःखम् । इस लिये, लग्नकी घड़ी न टल जाय, आप शीघ्र पधारिये । यह कह उठ कर चला फिर वह कर्पूरतिलक राज्यके लोभमें फँस कर शृगालके पीछे पीछे दौड़ता हुआ गाड़ी कीचड़में फँस गया । फिर उस हाथीने कहा-‘मित्र गीदड़ ! अब क्या करना चाहिये ? कीचड़में गिर कर मैं मरता हूं । लौट कर देख ।' गीदड़ने हंस कर कहा-‘महाराज ! मेरी पूंछका सहारा पकड़ कर उठो, जैसा मुझ सरीखेकी बात पर विश्वास किया तैसा शरणरहित दुःख का अनुभव करो । तथा चोक्तम्,— यदाऽसत्सङ्गरहितो भविष्यसि भविष्यसि । तदाऽसज्जनगोष्ठीषु पतिष्यसि पतिष्यसि' ॥ २०७ ॥ जैसा कहा है—जब बुरे संगसे बचोगे तब जानो जीओगे, और जो दुष्टोंकी संगतमें पड़ोगे तो मरोगे ॥ २०७ ॥