इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंअण्डकोष और शिशन बाहर होने पर इसकी संज्ञा पुरुष बन जाती है और पुरुष में पुरुषार्थ, उद्यमी, कठोर परिश्रम में भी लग जाना, आवाज में भी कड़कपन और दाड़ी-मूछों का निकलना आदि लक्षण पुरुष के बन जाते हैं।
अण्डकोष और शिशन अन्दर होने पर इसकी संज्ञा नारी बन जाती है और नारी में सौन्दर्य, कोमलता, आकर्षण, शीलता, लज्जा, मधुर कण्ठ और दाड़ी-मूछ का न होना, कमर का पतलापन और सीने पर उधार आदि लक्षण नारी के बन जाते हैं।
सूर्य गुण की प्रधानता होने पर ही अण्डकोष और शिशन बाहर होते हैं और चन्द्रगुण की प्रधानता होने पर ही अण्डकोष और शिशन अन्दर रहते हैं।
गर्भावस्था में ही समस्त अंगों का निर्माण होता है। यह निर्माण कार्य ६५-७० दिन में पूर्ण हो जाता है। सबसे अन्त में लिंग अर्थात् अण्डकोष और शिशन का निर्माण होता है। यह निर्माण १० दिन में आकर परिपूर्ण होकर परिपक्व भी हो जाता है। अर्थात् उस अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इसका प्रयोजन स्पष्ट है कि यदि ८० दिन के पास गर्भणी को सूर्य गुण की अधिकता से परिपूर्ण कर दिया जाये तो अण्डकोष और शिशन अन्दर ही न रुककर बाहर आ जाते हैं।
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इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri