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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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सितोपलादि चूर्ण वाला योग सेवन करायें तथा इस बीच में प्रातःकाल की अन्य औषधि बन्द रखें तथा भोजन के पश्चात् और रात्रि की औषधि चलती रहेगी। तत्पश्चात् निश्चित तिथि के दिन गर्भाधान प्रकरण में लिखित विधि से गर्भाधान करें। ध्यान रहे इस मास के अन्त में रजः प्रवर्तनी वटी का सेवन नहीं कराना चाहिए। अगले मास मासिक धर्म आने के समय तक प्रतीक्षा करें। यदि गर्भ स्थित न हुआ हो तो पुनः पुनः इसी रीति का प्रयोग करें। अवश्य ही गर्भ स्थित होगा। उपरोक्त क्रम के अनुसार स्त्री में रजः की उत्पत्ति में अधिकता हो सकती है, जिस कारण युग्म रात्रि में भी गर्भाधान करने पर कन्या के जन्म लेने की सम्भावना हो सकती है। इस कारण पुरुषों के लिए उचित है कि वे गर्भाधान की तिथि से कम से कम २ मास पूर्व इस वीर्य वर्धक योग का निम्न प्रकार अवश्य ही सेवन करें। प्रातः काल प्रयोग नं० ३३ के साथ स्वर्ण बंग। तीसरे प्रहर बानरीगुटका प्रयोग नं० ३१। रात्रि में चन्द्रप्रभावटी और शीत वीर्य गुटका, दोनों की दो-दो गोली दूध के साथ सेवन करें। इस प्रकार निरन्तर २ या ३ मास तक सेवन करने से वीर्य की मात्रा रजः से अधिक हो जायगी। (देखें कुछ अनुभव में ३१ और ३३)

बंगला अशोक की छाल को दरदरा कट लें, उसमें से ५० ग्राम छाल, २५० ग्राम पानी और २५० ग्राम दूध। सबको मिलाकर मन्द मन्द आग पर पकायें। जब पानी जल जाय तो उतार कर छान लें और रुचि के अनुसार मीठा मिलाकर स्त्री को सेवन करायें। यदि दो समय सेवन करा दें तो अति उत्तम है। इसका प्रयोग ३ मास तक कराने से गर्भाशय सम्बन्धी समस्त दोषों का निवारण हो जाता है, इसके पश्चात् चौथे मास में मासिक धर्म के चौथे दिन प्रातःकाल शिवलिंगों के ७ बीज सांबुत ही बिना दौत लगाये ताजे जल से निगल लें। पाँचवें दिन ९ बीज, छठे दिन ११ बीज, सातवें दिन १३ बीज, आठवें दिन १४ बीज, नवें

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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