भारतकोश
इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 250 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

हमारे स्वास्थ्य की नींव सच्ची पृथिवी से बहुत पहले पड़ती है। जब बालक गर्भ में होता है तब उसकी माँ को कैसा भोजन मिला है, प्रसव व्यवस्था कैसी हुई है, ये सभी बातें भावी सन्तान के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।

प्रकृति के अनुसार गर्भावस्था में माँ और शिशु दोनों के लाभ का विधान है। माँ से शिशु का पोषण होता है और प्रसव के उपरान्त माँ पहले से अधिक स्वस्थ और सुन्दर हो जाती है परन्तु ऐसा तभी सम्भव है जबकि गर्भवती स्त्री के स्वास्थ्य, भोजन, रहन-सहन और प्रसव आदि पर उचित ध्यान रखा जाये तथा सभी आवश्यक सुविधायें उपलब्ध हों।

गर्भवती स्त्री के रहन-सहन, भोजन, वंशवाद और प्रसव व्यवस्था का ध्यान और उचित सावधानी भावी शिशु और माता के स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त आवश्यक हैं।

गर्भिणी स्त्री के लिए वर्जित कर्म-उत्तर दिशा को सिर करके सोने से गर्भाश्रया नाड़ी गर्भध्रुव में लिपट कर गर्भ का संहार कर देती है। रात्रि में भ्रमण करने से उन्मादी। कलह करने से मृगी रोग वाली। समागम करने से दुर्बल, निर्लज्ज और नपुंसक सन्तान। शोक से उपरोक्त स्वल्प शरीर, अल्पायु चिन्तित, दूसरों को कष्ट देने वाली, ईर्ष्यालु सन्तान। क्रोध से क्रोधी कपटी। अधिक सोने से अधिक सोने वाली, मूर्ख, मन्दगिन वाली। मीठा अधिक खाने से प्रमेही, गूँगी, अति स्थूल रक्त पित्त नेत्र रोग, चर्मरोगी। इसी प्रकार लवण, कवैली आदि वस्तुओं का भी अधिक प्रयोग न करें।

देखा गया है गर्भिणी स्त्रियों को मिट्टी आदि खाने में अधिक रुचि हो जाती है। इससे शिशु को पांडु रोग होकर यकृत और प्लीहा निर्बल हो जाते हैं। यदि इसके स्थान पर ऐसी दशा में स्त्रियों को बंसलोचन दे दिया जाय तो वह उत्तम रहेगा। एक तो वह मिट्टी जैसा स्वाद देगा और दूसरे गर्भ में शिशु को कैलशियम पूरी मात्रा में मिल सकेगा।

इच्छानुसार सन्तान

१४०

वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri