इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरे मास में पलास का पंता, गिलोय, ब्रह्मी और सौठ का समान भाग चूर्ण ४ माशा दूध से सेवन करें, या इन चारों औषधियों को दूध में डाल कर पका छान कर सेवन करें।
तीसरे चौथे तथा पाँचवें मास में दूध में मधु मिलाकर पियें। छठे तथा सातवें मास में दूध में घी मिलाकर उपरोक्त चूर्ण का सेवन करें।
आठवें मास से दूध में १ माशा बादाम का शुद्ध तेल मिलाकर दें और तेल नित्य ॥ माशा बढ़ाते जायें, यहाँ तक कि तेल १० माशा तक पहुँच जाय, फिर १ माशा नित्य कम करके ४ माशे तेल नित्य देते रहें।
नवें मास में शुद्ध तिल के तेल का फोया योनि में रखें इससे बच्चा सुगमता से बिना किसी कष्ट के उत्पन्न होता है।
जब बच्चा गर्भ में बढ़ता है। उस समय स्त्री की इच्छा भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजनों को खाने की होने लगती है। इस इच्छा को रोकने से गर्भस्थ बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है और साथ में अखाद्य और अप्राकृतिक भोजन का भी। जैसे मिट्टी आदि। हम पीछे लिख आये हैं कि वंसलोचन मिट्टी जैसा स्वाद देता है, इससे मिट्टी खाने वाली स्त्रियों की तृप्ति हो जाती है और बालक भी गौर वर्ण का और पुष्ट होता है।
वस्त्र- गर्भावस्था में स्त्री को अपने वस्त्रों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। इन दिनों बहुत कसे वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। चोली और पेटीकोट ढीले बाँधने चाहिए। रात्रि को चोली और पेटीकोट को खोल देना अच्छा है। वस्त्र ऋतु अनुसार होने चाहिए। शरद ऋतु में ठण्ड से बचना, ग्रीष्म ऋतु में लू आदि से बचना तथा वर्षा ऋतु में सील तथा सीले वस्त्रों से बचना आवश्यक है। इन दिनों ऊँची एड़ी की चप्पल तथा फिसलने वाली चप्पल नहीं पहनने चाहिए इससे गिर जाने का भय रहता है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri