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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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उसे जल में अपनी और उसकी छाया से छाया मिलाकर दिखाया और समझाया। बेटा यह भेड़िये तो हमारा भोजन हैं और तु इनके साथ खेलता है। वही सिंह का बच्चा जो कुछ समय पूर्व भेड़ियों के साथ खेलता था वह अब उसे अपना भोजन समझने लगा।

देखिये! एक सिंह का बच्चा जो संगत से कुछ बदल गया था पुनः अपनी प्रकृति के अनुरूप बन गया। परन्तु भेड़ियों के बीच मानव का पला हुआ बच्चा अपना भोजन, बोली रहन सहन और प्रकृति आदि सभी कुछ छोड़ बैठा। वह अनेक प्रयत्न करने पर भी नहीं सुधर पाता।

इसी कारण मानव के निर्माण में हमारे महर्षियों ने संस्कारों की रचना की। मानव के बच्चे का स्वयं कोई स्वभाव नहीं होता, उसे संस्कारों द्वारा जैसा आप बनायेंगे वैसा ही बनकर तैयार होगा।

हम पीछे लिख आये हैं कि संस्कारों से ही उत्तम सन्तान होती है। गर्भाधान के पश्चात् पुंसवन संस्कार हो तत्पश्चात् सीमन्तोन्त्यन संस्कार होना चाहिए। यह संस्कार किस प्रकार किये जायें इसको लिखने की यहीं आवश्यकता नहीं क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती की लिखित संस्कार विधि में मनुष्यों के १६ संस्कार लिखे हैं उसी में से विधि देखकर करें।

★★★

प्रसव

समय जानना-समय रहते प्रसव की उचित व्यवस्था करने के लिए ये आवश्यक है कि प्रसव का सम्भावित समय ज्ञात हो। यह समय गर्भ स्थिति से ठीक ९ मास १० दिन पश्चात् होता है। यदि गर्भ में विकार है तो इससे पूर्व तथा पश्चात् भी प्रसव हो सकता है। गर्भ में जब भ्रूण सर्व प्रथम हिलता है, तो उसके ४ मास २० दिन के पश्चात् प्रसव (बालक का जन्म) होता है। अन्तिम मासिक धर्म होने की तिथि से आगे सात दिन जोड़ने के

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri