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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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पृष्ठ 183

गन्धारों राजा धृतराष्ट्र की पत्नी बड़ी पतिव्रता थीं। इनके पति अन्धे थे, तो यह भी सारी आयु अपनी आँखों पर पड़ी बाँधे रहیں। वे महाभारत युद्ध समाप्त होने के पश्चात् एक दिन कुन्ती से जो युधिष्ठिर की माता थीं कहने लगीं कि मैं जैसी पतिव्रता हूँ वैसी तु नहीं पर मेरे सब पुत्र युद्ध में मारे गये और तेरे सब जीवित हैं इसका क्या कारण है? क्या परमात्मा के घर भी अन्धे हैं? उसने उत्तर दिया— कदापि नहीं। पतिव्रता होने का फल है कि उसका पति जीवित रहे, सो यह सीमायु तुरन्त प्राप्त है तेरा पति जीवित है, पर उसका यह फल तो नहीं कि उसके पुत्र भी जीवित रहें। इस कार्य को तुने नहीं किया मैंने किया। सो मेरे पुत्र जीवित हैं तेरे नहीं। 'जो औरों का अहित चाहता है उसका स्वयं अहित होता है।' यह बात सत्य और पुरातन है।

तुने मेरे पुत्रों को मारने के अर्थ लाक्षादि भवन बनवाया यह सोच कर कि उसमें आग लगा दी जायेगी तो सब मर जायेंगे, पर मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है। मुझे विदुर द्वारा पता लग गया, मैं अपने बच्चों को उसमें से निकाल ले गई। पीछे आग लगा दी गई और भीलनी पाँच पुत्रों सहित जलकर मर गयी। ऐसी दशा में तेरे पुत्र कैसे जीवित रहते।

'आज भी मूर्ख स्त्रियाँ चौराहों आदि में उतारे कराकर इस लिये रखती हैं कि उनको लौधकर औरों के बच्चे मर जायें और मेरे बच जायें। जिसका परिणाम बहुधा उल्टा ही होता है। कोई दुष्टा तो मेढ़े, बकरे, मुर्गे आदि यह समझ कर कटवाती हैं कि जीव के बदले जीव देने से मेरा बच्चा बच जायगा और एक हत्या का पाप सर पर रखती हैं। परमेश्वर को भोला बुद्ध अपना जैसा जानती हैं। ईश्वर के यहीं भी अन्धे समझ रखा है।'

पुत्रों को जीवित रखने का उपाय मैंने किया।

देख लो मेरा पति जीवित नहीं पर बच्चे जीवित हैं।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri