इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता है। वह तो स्वतः गर्म और ठण्डे तार हैं? फिर यह एक और गर्म ठण्डे तार का फारमूला बीच में कहीं से आ गया।
प्रिय पाठकों! आपका यह विचार सत्य है। लौकिक व्यवहार में ऐसा ही दीख पड़ता है। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो प्रत्येक शरीर में ऋणात्मक और धनात्मक विद्युत धारायें कार्य कर रही हैं। यहीं पर स्त्रियों के ऋणात्मक तथा पुरुषों के धनात्मक विद्युत का केवल इसी प्रकार का सम्बन्ध है जिस प्रकार बिजली का प्रकाश आगे बढ़ाने के लिये वालसाकिट और प्लक होता है। यदि दोनों को सही और सीधा मिलाया जाय तो प्रकाश होता है और उल्टा विपरीत मिलाने पर प्रकाश नहीं होता। इसी प्रकार हम स्त्री को वाल साकिट और पुरुष को प्लक कह सकते हैं। वालसाकिट रूपी स्त्री में प्लक रूपी पुरुष का सही मिलन होने पर जो प्रकाश उत्पन्न होता है वह सन्तान होती है। एक का बायीं नासिका स्वर और दूसरे का दायीं नासिका स्वर चल रहा हो तो सन्तान रूपी प्रकाश होगा। इन दोनों के विपरीत मिलन होने पर अर्थात् दोनों के दायें या बायें नासिका स्वर (दोनों के समान स्वर) चल रहे हों तो सन्तान रूपी प्रकाश नहीं होगा।
क्रिया-स्त्री-पुरुष दोनों के नासिका स्वर एक समान हों अर्थात् दोनों की नाक के दायें नथने से श्वास आती जाती हो अथवा दोनों की नाक के बायें नथने से श्वास आती जाती हो तो ऐसी अवस्था में रति करने पर कदापि गर्भ स्थित नहीं होगा।
द्वितीय साधन-रजोऽदर्शन के समय गर्भाशय का मुख खुलता है। प्रथम के तीन दिन रजः श्राव होने के फलस्वरूप रति के लिये निषिद्ध हैं। इसके पश्चात् शनैः-शनैः गर्भाशय का मुख सिकुड़ने लगता है जो १६ दिन के पश्चात् बन्द हो जाता है। प्रथम के १४ दिन पूर्ण रूपेण अरक्षित हैं, इन दिनों में शत-प्रतिशत गर्भ स्थापित हो सकता है। इसके पश्चात् १५, १६ रात्रियों में ५०
इच्छानुसार सन्तान
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चैरिन्द्र गुप्तः
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