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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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'उ' की मात्रा 'म' के नीचे लगती है। यदि 'उ' रूपी जीव 'अ' रूपी ईश्वर की ओर अग्रसर हो तो जीव उन्नति को प्राप्त होता है जैसे 'उ' की मात्रा 'अ' के ऊपर लगती है अर्थात् 'अ' और 'उ' मिलकर ओ हो जाता है। इसी प्रकार जब जीव प्रकृति की ओर चलता है तो बजाय ऊँचा उठने के नीचे ही गिरता जाता है और जब वह ईश्वर की ओर को अग्रसर होता है तो वह जीव उत्कृष्टता को प्राप्त होता जाता है और शनैः शनैः बढ़ता हुआ परम सौरभ्य को प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए सुख और शान्ति से जीवन व्यतीत करने के लिए मनुष्यों को चाहिए कि वह भोगों में न फँसकर अपना जीवन सादा, वासनाओं से रहित एवं सत्यनिष्ठ बनावे।

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्यबुद्धिप्रसादजम्।।

गीता १८/३७

अर्थ- वह (सुख) प्रथम साधन के आरम्भ काल में (यद्यपि) विष के सदृश भासता है (परन्तु) परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए जो ईश्वर विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न हुआ सुख है वह सात्त्विक कहा गया है।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।

परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।

गीता १८/३८

अर्थ- जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है वह (यद्यपि) भोगकाल में अमृत के सदृश भासता है (परन्तु) परिणाम में विष के सदृश है (बल, वीर्य, धन, उत्साह आदि का नाशक है) इसलिए वह सुख राजस कहा गया है।

पश्चिमी सभ्यता में वह व्यक्ति महान है जिसकी अधिक से अधिक आवश्यकताएँ हों। परन्तु भारतीय सभ्यता में महान वह है जिसकी आवश्यकताएँ कम से कम हों। क्या सादा पहिनावा

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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