इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थ- जैसे हजारों गायों की विद्यामानता में बछड़ा माता ही के निकट जाता है, वैसे ही जो कुछ कर्म किया जाता है वह कर्ता को ही मिलता है। अर्थात् जो कर्म करेगा वही फल भोगेगा दूसरा नहीं।
तभी तो कहा है कि मनुष्य को कर्तव्य कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीना चाहिए।
कूर्वन्ने वेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवंतर्विं नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
यजुर्वेद ४०/२
अर्थ- इस लोक में अपने कर्तव्य कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करना चाहिए। यही तेरे लिए एक मार्ग है इससे दूसरा कोई मार्ग नहीं, कर्तव्य कर्म करने से मनुष्य में दोष नहीं होते। इस जगत में परम पुरुषार्थ करते हुए ही मनुष्य को दीर्घ जीवन प्राप्त करने की इच्छा करनी चाहिए। पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करना ही मनुष्य का परम धर्म है। कर्तव्य कर्म करने से ही सब दोष दूर हो जाते हैं और मनुष्य निर्दोष होकर उत्तमता को प्राप्त होता है।
जबकि आज का कर्म प्रारब्ध, भाग्य के रूप में हमारे ही सामने आता है तो फिर क्यों न अच्छे कर्म करें जिससे प्रारब्ध भी अच्छा बने। अच्छे कर्म जिसे कर्तव्य कर्म भी कहते हैं करने के लिए धर्म तथा ईश्वर का सहारा लेना ही पड़ेगा। ईश्वर के चिन्तन से बुद्धि पवित्र होकर ही कर्म अकर्म का विचार कर सकोगी।
धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे,
नारी गृह द्वारि सखा रमशाने।
देहरिचतायां परलोक मार्गं,
धम्मानुगो गच्छति जीव एकाः।
इच्छानुसार सन्तान
२४
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri