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इच्छानुसार संतान

इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

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अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायीं ओर अग्नि रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।

सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दीर्घों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु र्वींस द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।

रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य को द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।

एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri