इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिपि पृथ्वी पर कोई ऐसा कार्य नहीं जिसे सिद्ध न कर सकें।
यही अकाल मृत्यु को विजय करता है। ब्रह्मचर्य पालन ही आयु बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है। यही मनुष्य को अमर बना देता है इसी को बल प्रताप से असम्भव बातें भी सम्भव दीख पड़ने लगती हैं। भीष्म पितामह ने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा को अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल से पूर्ण किया जो संसार में सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। अंजनी सुत अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान ने अकेले ही सारी लंका को योद्धाओं के छवकें छुड़ा दिये और अन्त में सारी लंका को अग्नि के अर्पण करके माता जानकी की सुध ले वापिस लौटकर श्रीरामचन्द्र जी को समाचार दिया। आप इन घटनाओं को त्रेता और द्वापर की कहकर छोड़ देंगे, तो आप कलयुग की उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारक ऋषि दयानन्द सरस्वती को ही ले लीजिये यह उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल तथा तेज का ही कारण है कि आज भारतवर्ष की काया ही पलटी दीखती है। सन् १८५७ की राज्य क्रान्ति के पश्चात् स्वतन्त्रता का शब्द लुप्त हो गया था उस समय स्वतन्त्रता शब्द को मुख से निकालना मानों मृत्यु को आमंत्रित करना था परन्तु ऐसे भयंकर समय में जबकि भारत पर पश्चिमी शासकों का पूरा दमन चक्र चल रहा था और भारतीय जनता को खटमल और चींटी के समान मसला जा रहा था, जिसके फलस्वरूप भारतवासी अपने शब्दकोष से स्वतंत्रता शब्द को निकाल चुके थे, क्योंकि स्वतंत्रता के शब्द को उच्चारित करने वाले को गोली लगा दी जाती थी। ऐसे भयंकर समय में और यह जानते हुए भी, इस समय भारत में मेरे विचारों जैसा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं है। तिस पर भी एक अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य बल के प्रताप और ईश्वर की अपने ऊपर छाया के ही सहारे निर्भय निःसंकोच और स्वाभिमान के साथ कलकत्ते के भरे दरबार में वायसराय के सामने ऋषि दयानन्द सरस्वती ने गरज कर कहा कि अपने राज्य में चाहे सूखे चने ही क्यों न
इच्छानुसार सन्तान
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विरेंद्र गुप्तः
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