इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंकामी पुरुषों का यह कहना है कि जब एक बार के भोग में ४० दिन के भोजन से बना यह वीर्य निकल जाता है, तो जब हम नित्य भोग करते हैं तो यह वीर्य कहीं से आता है। वह वीर्य संचित कोष से आता है जो बचपन से २५ वर्ष तक संचित होता रहता है। परन्तु ऐसे पुरुषों का वही हाल होता है, जैसा आयु कम और व्यय अधिक करने वाले का दिवाला निकल जाता है। उसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है।
कच्ची कलियाँ तोड़ने से पुष्पों की महक मारी जाती है कच्चे फल तोड़ लेने से फलों का स्वादिष्टपन का आनन्द नहीं मिलता, कच्चा भोजन खाने से रोग उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार अपरिपक्व वीर्यपात से नपुन्मकत्त्व आदि महा भीषण रोग उत्पन्न हो जाते हैं जो मनुष्य को काल के गाल में शीघ्रतया पहुँचाने के लिए सहज साधन का कार्य करते हैं। ऐसी उत्तम वस्तु (वीर्य) को सुरक्षित रखने से जीवन प्राप्त होता है और पतन से मृत्यु।
मरणम् विन्दुपातेन जीवनम् विन्दु धारणम्।
तस्मात् अति प्रयत्नेन कुतृते विन्दु धारणम्॥
अर्थ— वीर्य का पतन मरण है, वीर्य धारण से जीवन, इस लिए अति प्रयत्न से वीर्य बिन्दु को धारण करें और रक्षा करें, उसका व्यर्थ क्षय न होने दें।
इसके अकालपात से मनुष्य केवल ठटरी रह जाता है। ऐसा पुरुष गृहस्थाश्रम का पूर्ण सुख अनुभव नहीं कर सकता। बाल्यवस्था (विद्यार्थी जीवन में) काम वासनाओं में प्रवृत्त हो जाने से युवाकाल में मुख लालिया रहित सौन्दर्य और तेज रहित तथा अशोभनीय लगता है। प्रथम तो ऐसे स्त्री पुरुषों के सन्तान ही नहीं होती, यदि होती भी है तो निर्बल, निस्तेज, मलीन, कुरूप, विद्याहीन, बलहीन, रोगी और निकृष्ट होती है। क्या जिस भारतवर्ष देश के अन्दर तैंतीस करोड़ देवता थे अर्थात् यहाँ का एक-एक नागरिक देवता के नाम से पुकारा जाता था। सारे संसार को विद्या सम्यत्ता
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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