इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 250 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थ- जिस पिता ने पर स्त्री गमन के भावों को स्वप्न में भी नहीं आने दिया और जिस माता ने स्वप्न में भी पर पुरुष को और दृष्टिपात नहीं किया, ऐसे माता-पिता से जो पुत्र उत्पन्न होगा उसका मन इनको देखकर कभी विचलित नहीं होगा।
जिस प्रकार सुदृढ़ भवन बनाने के लिए भवन की नींव भी सुदृढ़ बनानी पड़ती है। जिस भवन की नींव कमजोर टेढ़ी होगी उसके ऊपर का भवन भी कमजोर और टेढ़ा ही रहेगा। चाहे ऊपर कितनी ही लीपा-पोती को जाय परन्तु वह भवन टिकाऊ नहीं हो सकता। इसी प्रकार जब तक यज्ञ कुट्टार के चाक पर घूम रहा है तब तक कुट्टार उसे सीधा कर सकता है और जब वह चाक से नीचे उतर आया और जरा-सा भी सूख गया तो उस घड़े को जो टेढ़ा हो गया है, वह सीधा नहीं कर सकता, उसे तोड़ कर ही दूसरा बनाना पड़ेगा, इस बात को महर्षि दयानन्द सरस्वती ने विचारा। वह यह भी जानते थे कि समाज से व्यक्ति नहीं बनता, परन्तु व्यक्ति से समाज बनता है। इसलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने व्यक्ति के निर्माण की बात को विचारा। उस विचार को संस्कार विधि के रूप में उधृत किया, साथ ही भवन की नींव के आधार पर सबसे पहला संस्कार गर्भाधान ही रखा, क्योंकि वह जानते थे कि जिस दम्पति का गर्भाधान संस्कार, संस्कार के रूप में उत्तम रीति से होगा तब उस गर्भ से उत्तमोत्तम सन्तान उत्पन्न होगा।
महर्षि के इस महत्त्व को किसी ने नहीं समझा, न संस्कार विधि उठाकर देखी, न उस पर विचार किया, न कभी समझने का प्रयत्न ही किया, और करने भी क्यों? क्योंकि इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी ने प्रेरित भी नहीं किया और इसे अश्लील भी समझा। परन्तु यह विज्ञान अश्लील नहीं, यह परिवार, जाति, देश और संसार को पलट देने की शक्ति रखने वाला ज्ञान है। संसार में देश, जाति को गौरवमय वैभव प्राप्त कराने की इच्छा
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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