भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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शुभाशंसन महामाहेश्वर आचार्यप्रवर श्रीमदुत्पलदेवाचार्य द्वारा विरचित 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ग्रन्थ का काश्मीरी, 'प्रत्यभिज्ञादर्शन' या 'शैवाद्वैतदर्शन' में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रन्थ को उक्त दर्शन का प्रस्थान भी कह सकते हैं। श्रीमदुत्पलदेवाचार्य के प्रशिष्य 'तन्त्रालोककार', महामाहेश्वर श्रीमद्-अभिनवगुप्ताचार्य थे। 'तन्त्रालोक' प्रत्यभिज्ञादर्शन का सर्वाधिक महनीय, प्रामाणिक एवं विशाल ग्रन्थ है। श्रीमद्-अभिनवगुप्त- पादाचार्य के गुरु के गुरु श्रीमदुत्पलदेवाचार्य ने जिन मान्यताओं को अपने 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ग्रन्थ में प्रतिष्ठापित किया वे मान्यतायें उक्त दर्शन में आगे चलकर पल्लवित और पुष्पित हुई। उनके सब से बड़े व्याख्याकार श्रीमद्-अभिनवगुप्तपादाचार्य थे जिन्होंने भरत के 'नाट्यशास्त्र' की भी 'अभिनवभारती' टीका लिखी थी। उन्होंने ही अत्यन्त विशालकाय शैवदर्शन के सब से विशिष्ट ग्रन्थ 'तन्त्रालोक' की रचना द्वारा उक्त दर्शन को अमर बना दिया। महाराजा कश्मीर के राज्यद्वारा संचालित शैवदर्शन की ग्रन्थमाला में शैवदर्शन के पचासों महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुए थे। 'तन्त्रालोक' भी इसी ग्रन्थमाला में प्रकाशित होकर प्रकाश में आया था। श्रीमद्- अभिनवगुप्तपादाचार्य की 'विमर्शिनी' व्याख्या सहित, 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' भी वहीं प्रकाशित थी। परन्तु अत्यन्त स्वल्प मूल्यवाले उक्त माला के ग्रन्थ आज दुर्लभ हो रहे हैं। अभिनवगुप्तपादाचार्य को प्रामाणिक, 'विमर्शिनी' व्याख्या युक्त 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ग्रन्थ का सर्वदर्शनाचार्य श्रीकृष्णानन्द सागर की 'शिवरञ्जनी' टीका के साथ प्रकाशन स्तुत्य प्रयास है। यद्यपि 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा', पर लिखित अभिनवगुप्तपादाचार्य की 'विमर्शिनी', नामक टीका अत्यन्त पाण्डित्यपूर्ण है तथा 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' की सूत्रात्मक कारिकाओं को समझने के लिए कुंजिका है तथापि संस्कृत न जाननेवालों के लिए वह अर्थहीन हो जाती है। आचार्य श्रीकृष्णानन्द सागर का हिन्दी व्याख्या के साथ प्रकाशन का यह कार्य निश्चय ही प्रशंसनीय और संस्कृत न जाननेवाले शैवाद्वैतदर्शन के समुत्सुक जिज्ञासुओं के लिए बड़ा सहायक सिद्ध होगा। हिन्दी टीकाकार को एतदर्थ मैं हार्दिक बधाई देता हूँ और विश्वास करता हूँ कि यह ग्रन्थ जिज्ञासु सुधीजनों में लोकप्रिय होगा। पं० करुणापति त्रिपाठी भूतपूर्व कुलपति—सम्पूर्णानन्द-संस्कृत-विश्वविद्यालय एवं वर्तमान अध्यक्ष—उत्तर-प्रदेश-संस्कृत-अकादमी