भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

अ.-१, आ.-८, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १६५ आन्तरत्वे तस्मात् न अर्थक्रिया इति, अर्थक्रियाभासोऽपि च आभासान्तरमेव इति अर्थक्रिया- कारित्वमपि न भावानां सत्त्वम्, येन तदभावे स्वरूपत एव अभावः स्यात् ॥ ६ ॥ ननु च बाह्याभासव्यतिभेदनकाले आन्तराभासो विरोधात् विच्छिन्न इति कथम् इदम् उक्तम् ‘आन्तराणां य आभासः स सदा’ इति ? एतत् परिहरति— चिन्मयत्वेऽवभासानामान्तरैव स्थितिः सदा । मायया भासमानानां बाह्यत्वाद्वहिरप्यसौ ॥ ७ ॥ इह अवभासानां सदैव बाह्यताभासतदभावयोः अपि अन्तरैव प्रमातृप्रकाश एव स्थितिः, यत एते चिन्मयाः, अन्यथा नैव प्रकाशेरन् इति उक्तं यतः, यदा तु मायाशक्त्या विच्छेदनाव- भासनस्वातन्त्र्यरूपया बाह्यत्वम् एषाम् आभास्यते तदा तत् अवलम्ब्य अवभासमानानाम् असौ स्थितिः बहिरपि अन्तरपि, नायम् अन्तराभासो बाह्यत्वस्य विरोधी प्रत्युत सर्वभासभित्ति- भूतोऽसौ, तत् कथं विरोधः ? इति युक्तमुक्तम्—‘सदैव आन्तराणां सत्ता’ इति ॥ ७ ॥ ननु बाह्यत्वे सति अर्थक्रिया, तच्च बाह्येन्द्रियगम्यत्वम्, न च विकल्पोल्लिखितानां तत् इसीलिए पूर्व आभास के भेद का अभाव रहता है—जिस हेतु से प्रमाता के आन्तर में ऐक्यरूप होने से अर्थक्रिया नहीं होती और अर्थक्रिया का आभास भी नहीं होता है किन्तु दूसरा ही आभास रहता है। इस प्रकार अर्थक्रियाकारिता भी पदार्थ-भावों की सिद्धि नहीं करती है, जबकि उसका अभाव हो जाने पर अपने आप ही दूसरे का अभाव हो जायेगा ॥ ६ ॥ अब शङ्का उठाते हैं कि बाहरी आभास के संभेदन काल में विरोध होने के कारण [ एक का ही आन्तरत्व और बाह्यत्वरूप न होने से ] आन्तराभास विच्छिन्न होता है, यह आपने कैसे कहा है ? ‘आन्तराणां य आभासः स सदा [ ......सत्ता त अस्तेषामान्तराणां सतां सदा इत्यत्र ] इसका परिहार करते हैं— आभासों के चिन्मय प्रमाता में लीन हो जाने पर निरन्तर आन्तर स्थिति बनी रहती है। माया के द्वारा भासित होने पर बाहर में आ जाने के कारण बाह्यस्थिति भी रहती है ॥ ७ ॥ अवभासों के बाहर की ओर भासना अथवा उसके अभाव का भासना ये दोनों भीतर ही प्रमाता के प्रकाश में रहते हैं, जिससे ये भाव में और अभाव में भी चिन्मय ही रहते हैं [ चिन्मय- रूप न होने से प्रकाशित नहीं हो सकता है ‘नाप्रकाशः प्रकाशते’ ] अन्यथा इनका प्रकाश ही नहीं होगा; क्योंकि हमने इस विषय में पहले ही कह दिया है, किन्तु जब माया-शक्ति के द्वारा विच्छेदन अवभास में स्वातन्त्र्यरूप से रहता है उसके माध्यम से ही इसका बाहर में भासित होना संभव है, तब उस समय बाह्यत्व का अवलम्बन करके अवभासों की स्थिति बाहर और भीतर दोनों में भी रहती है, यह अन्तराभास बाह्यत्व का विरोधी नहीं है प्रत्युत प्रमाता के प्रकाश में विश्रान्ति को पा लेने के कारण सब आभासों का मूल अन्तराभास होता है, इसलिए वह कैसे विरोध करेगा ? इसी कारण उचित ही कहा है—‘सदैव आन्तराणां सत्ता’ अर्थात् आन्तर आभासों की सत्ता सर्वदा बनी रहती है ॥ ७ ॥ अब शंका करते हैं कि बाह्यता का ज्ञान रहने पर ही पदार्थों की अर्थक्रिया बनती है और बाह्यत्व का ज्ञान बाह्येन्द्रियों के द्वारा ही हो सकता है, इस प्रकार विकल्पों से होनेवाले