ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-२, आ.-३, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २२७ युक्तः, तद्वत् एकप्रकाशभित्तिलग्नत्वेन वैचित्र्यात्मकभेदोपपत्तिः इति भावभेदग्रहणप्रकाशभित्ते- रनपायिनीं स्वप्रकाशतामाह । तत्र स्वप्रकाशे किं प्रमाणेन ? अथोच्यते पूर्वमस्य प्रकाशो न भवति, तर्हि स एव नास्ति, — इति स्यात् प्रकाशमात्ररूपत्वात् तस्य । न च अस्य नास्ति, — इत्य- भावेन स्पर्श उपपन्नो, यतो हि असावेव परमार्थतः सन् प्रकाशस्यैव सत्त्वात्, सतश्च असद्रूपत्वा- योगात् । अथ उच्यते—ईश्वरता तस्याप्रमिता प्रमास्यते तदपि न, यतो हि असौ प्रमातृत्वेन चेत् नाचकास्यत् कस्यायमुद्यमः, चकास्ति चेत् तर्हि प्रमातृत्वैव ईश्वरता, तदाह 'ईश्वरे प्रमातरि सर्वदा भातविग्रहे' इति । विशेषेण गृह्यते इति विग्रहोऽसाधारणं स्वरूपम्, तत एव स्वतन्त्रप्रकाश- नेन यः कालव्यवहारः सोऽत्र नास्ति, — इति 'पुराणे' इत्युक्तम् । तत्र किं प्रमाणं, कुतः प्रयोजनात्प्रमाणं, कस्तत्र प्रमाणस्योपयोगः, — इति, तत्र च किं प्रमाणं न किञ्चित् उपपत्त्या घटते इत्यर्थः । यतः प्रमाणं नामाभिनवाभासरूपं प्रमातरि प्रमितिलक्षणां विश्रान्तिं विदधत् प्रमाणं भवति, प्रमाता चाविच्छिन्नाभासः सर्वाश्च प्रमितीः स्वात्मनि अन्तर्मुखरूपे भजते । तत् तस्मिन् कथमभिनव आभासस्तत्प्रमितिश्च कुत्र विश्राम्यतु । तस्मात् देहप्राणपुर्यष्टकशून्यप्राय एव प्रमातरि प्रमाणमुच्यताम् । तत्रापि च वेद्यांशे यदि नाम, न तु कथंचित् संविदंशे, तत्रापि विभागवाली भूमि में गंभीर नाभि ऊपर की ओर उठे हुए स्तन इत्यादि का चित्र में आभास होता है, उसी प्रकार एक प्रकाशवाले अर्थात् समान भित्तिवाले चित्र में ही भेदों की उपपत्ति हो सकती है । उसी को भाव-भेद ग्रहण करनेवाली भित्ति का कभी नहीं विनष्ट होनेवाला प्रकाश कहा जाता है । स्वप्रकाश में प्रमाण का क्या प्रयोजन है ? यदि कहते हो कि पूर्व में इसका प्रकाश नहीं होता तो वही नहीं रहता है, इसीलिए मानना पड़ेगा कि प्रकाशरूप होने के कारण सर्वदा रहता ही है, उसका भासन नहीं रहता है—ऐसा जब आप बोलेंगे तो अभाव से ही ईश्वर का स्पर्श हो जाता है; वस्तुतः वही परमार्थ प्रकाश की सत्ता भी है और सत्य का एवं असत्य का योग नहीं बैठ सकता । यदि कहो कि उसकी ईश्वरता अपरिमित है, कभी उसका परिमाण हो जायेगा तो यह भी बात नहीं है; क्योंकि उसको यदि प्रमाता मान लेंगे तो यह किसका उद्यम है, इसका पता लगाना कठिन हो जायेगा । यदि किसी प्रकार बोध हो भी गया— तो भी, प्रमाता को ही ईश्वरता कहना पड़ेगा । इस बात को लेकर कहते हैं कि 'ईश्वरे प्रमातरि सर्वदा भातविग्रहे' यदि प्रमाता है, तो सर्वदा उसका प्रकाश होना चाहिए । विग्रह शब्द का यही अर्थ है कि जिसका स्वरूप विशेषरूप से गृहीत होता हो और उसीको विग्रह भी कहना चाहिए । इसीलिए स्वतन्त्र प्रकाश होने के कारण अभाव स्पर्श का अयोग्य प्रवेश जो काल का व्यवहार है—वह यहाँ पर नहीं हैं, इसीलिए 'पुराणे' शब्द आया है । उसमें प्रमाण क्या है ? किस प्रमाण से प्रयोजन है, प्रमाण का कौन सा वहाँ पर उपयोग देखा जाता है ? और वहाँ पर प्रमाण की कोई उपपत्ति नहीं बैठ रही है । जब कि प्रमाण उसी का नाम है जो नूतन अभिनव आभासरूप प्रमाता में प्रमाणरूप विश्रान्ति को पाते हुए प्रमाता होता है और प्रमाता निरन्तर आभास से युक्त रहता है सब प्रमाएँ अपने आप उसमें अन्तर्मुख होकर रहती है । वह उस प्रमाता में नया आभास या प्रमा कैसे कहाँ विश्राम लेगी ? इसीलिए देह, प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार और पञ्च- तन्मात्राएँ (शब्दादि) इन सबों से शून्य ही प्राण प्रमाता में प्रमाण रहता है—ऐसा कहना चाहिए वह भी विद्यांश में ही विश्राम लेगा किसी प्रकार भी ज्ञानांश में नहीं लेगा और विषयके