जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला परिच्छेद १५. कक्कटक वर्ग १४१. गोध जातक (२) "न पापजनससेवी..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय विपक्षी भिक्षु की संगत करने वाले भिक्षु के बारे में कही। वर्तमान कथा महिलामुख जातक¹ की कथा के ही समान है। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व गोह के रूप में पैदा हुए। बडे होने पर वह नदी के किनारे एक बडे बिल में सैकडो गोहो के साथ रहने लगे। उनके पुत्र गोह-पिल्ले की एक गिरगिट के साथ दोस्ती हो गई। वह उसके साथ आनन्द मनाता और गले लगाने के लिए उस पर आ पडता। उस गिरगिट के साथ उसकी दोस्ती की बात गोहराज से कही गई। गोहराज ने पुत्र को बुलाकर कहा— "तात ! तू अनुचित स्थान में विश्वास कर रहा है। गिरगिट की जाति नीच होती है। उनका विश्वास नही करना चाहिए। यदि तू उसका विश्वास करेगा, तो तेरे और गिरगिट के कारण यह सारा गोह-कुल विनाश को प्राप्त होगा। अब से इसके साथ दोस्ती मत रख।" उसने दोस्ती नही ही छोडी। ¹महिलामुख जातक (२६)