जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ें११० [ १.१५.१४३
१४३. विरोचन जातक
“लसी च ते निष्फलता...” इसे शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के गयाशीर्ष¹ पर सुगत (तथागत) की नकल करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जब देवदत्त का ध्यान (-बल) जाता रहा और उसको लोगों से जो प्राप्ति होती थी वह बन्द हो गई तथा लोगों ने उसका सत्कार करना छोड़ दिया तो उसने सोचकर एक उपाय निकाला। उसने बुद्ध से पाँच बातों² की याचना की, जिन्हें शास्ता ने अस्वीकार किया। तब उसने दोनों अग्रश्रावकों³ के पाँच सौ शिष्यो को जो अभी प्रव्रजित हुए तथा धर्म विनय से सुपरिचित न थे बहकाया और उन्हें गयाशीर्ष पर ले जाकर संघ मे भेद पैदा कर एक सीमा⁴ में पृथक विनय-कर्म⁵ करने लगा। शास्ता ने उन भिक्षुओं के आने का समय देख दोनो अग्रश्रावको को भेजा। उन्हें देख देवदत्त प्रसन्न हुआ। रात को धर्मोपदेश देते समय उसने सोचा कि मैं बुद्ध की नकल करूँगा। वह बोला—सारिपुत्र ! भिक्षु-संघ
¹ गया का ब्रह्मयोनि पर्वत । ² पाच बातें यह हं—(१) जिन्दगी भर वन में ही रहा करें (२) जिन्दगी भर भिक्षा मांग कर ही खाएं (३) जिन्दगी भर फेंके चीथड़ों के ही चीवर पहनें (४) जिन्दगी भर पेड़ के नीचे ही रहें (५) जिन्दगी भर मछली मास न खाएं (चुल्लवग्ग, द्वितीय भाणवार)। ³ सारिपुत्र और मौद्गल्यायन । ⁴ सीमित-प्रवेश । ⁵ साधिक कर्म ।