जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंविरोचन ] ११३ दिया।' इतनी सी बात के लिए अनुदार न हो। सिंह ने कहा—जम्बुक ! तेरी सामर्थ्य हाथी मारने की नहीं है। गीदड-कुल में पैदा होकर कोई गीदड हाथी को मारकर उसका मास खा सके, ऐसा गीदड दुनिया में नहीं है। तू ऐसी इच्छा मत कर। मेरे द्वारा मारे जाने वाले हाथियो का मास खाकर ही रह। ऐसा कहने पर भी वह नहीं माना। बार बार कहता ही रहा। सिंह ने जब देखा कि वह नहीं मानता तो स्वीकार कर कहा—अच्छा ! तो मेरी रहने की जगह पर जाकर लेट रह। जम्बुक को कञ्चनगुफा में लिटा पर्वत की चोटी पर चढ मस्त हाथी को देख गुफा के द्वार पर जाकर कहा— जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा। श्रृगाल कञ्चनगुफा से निकला, जम्हाई ली, चारो ओर देखकर तीन बार आवाज की। फिर मस्त हाथी के सिर पर आक्रमण करने जाकर उसके पाँव में गिरा। हाथी ने दाहिना पाँव उठाकर उसके सिरपर रख दिया। सिर की हड्डियाँ चूर चूर हो गईं। उसके शरीर को हाथी ने पाँव से इकट्ठा किया, और उस पर लीद करके चिंघाड़ता हुआ जगल मे चला गया। बोधिसत्त्व ने यह हाल देख, 'जम्बुक ! अब अपना पराक्रम दिखा' कह, यह गाथा कही— लसी च ते निष्फलिता मत्थको च विदाळितो, सब्बा ते फासुका भग्गा अज्ज खो त्वं विरोचसि ॥ [तेरे सिर का भेजा निकल गया है। मस्तक फट गया है। तेरी सभी हड्डियाँ टूट गई हैं। आज तू अपना पराक्रम दिखा रहा है।] लसी का मतलब है माथे का भेजा। निष्फलिता, निकल आई। बोधिसत्त्व ने यह गाथा कही। जब तक जीवन था तब तक जीवित रह • कर्मानुसार (परलोक) सिधारे। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गीदड देवदत्त था। सिंह मैं ही था। ८