भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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नङ्गुट्ठ] ११५ है तो तीनो वेद सीख। यदि ब्रह्मलोक जाना चाहता है तो आग लेकर जगल चला जा, वहाँ अग्नि की पूजा करते हुए महाब्रह्मा को प्रसन्न कर ब्रह्मलोक गामी होना।" उसने कहा, मुझे गृहस्थी से काम नहीं। यह आग ले जगल में प्रवेश कर, वहाँ आश्रम बना अग्नि-पूजा करता हुआ अरण्य में रहने लगा। उसे एक दिन किसी प्रत्यन्त-ग्राम से दक्षिणा में एक बैल मिला। उस बैल.. को आश्रम पर लेजाकर उसने सोचा—अग्नि-भगवान को गो-मास खिलाऊँगा। तभी उसे ख्याल आया—यहाँ नमक नहीं है। अग्नि भगवान् बिना नमक के खा न सकेंगे। गाँव से नमक लाकर अग्नि-भगवान को नमक सहित खिलाऊँगा। वह बैल को वैसे ही बांध नमक लेने के लिए गाँव गया। उसके जाने पर, बहुत से शिकारी वहाँ आए। उन्होंने बैल को देख उसे मार डाला और उसका मास पका खाकर उसकी पोछ, जाँघ तथा चर्म वही छोड़कर शेष मास लेकर चले गए। ब्राह्मण ने लौटकर जब केवल पूँछ आदि को देखा तो सोचने लगा—यह अग्नि भगवान् अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी तो क्या रक्षा करेंगे ? यह अग्नि-पूजा निरर्थक है। इससे कल्याण या उन्नति नहीं है। 'उसका मन अग्नि-पूजा की ओर से उदासीन हो गया। वह बोला—'भो ' अग्नि-भगवान् ! तुम अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी क्या. रक्षा करोगे ? मास तो नही है, इतने से ही सन्तुष्ट होओ।' यह कह पूँछ आदि को आग में फेंकते हुए यह गाथा कही— बहुम्पेतं असब्भि ! जातवेद ! यं तं वालधिनाभिपूजयाम, मंसारहस्स नत्थञ्ज मंसं नङ्गुट्ठम्पि भवं पटिग्गहातु ॥ [ हे असत्पुरुष ! अग्निदेव ! यह भी बहुत समझें कि हम पूँछ से तेरी पूजा कर रहे हैं। तुझे मास मिलना योग्य था, लेकिन मास नही है। इसलिए आप जनाब पोछ ग्रहण करे । ] बहुम्पेतं, इतना भी बहुत है, असब्भि, असत्पुरुष ! असाधुजानिक । जातवेद, अग्नि को सम्बोधन करता है। अग्नि जात होने ही पैदा होते ही अनु- भव होती है, ज्ञात होती है, प्रकट होती है—इसलिए जातवेद कहलाती है।