भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पुप्फरत्त ] १२३ दे, पीट, बांधकर दिन होने पर राजा के पास ले गए । राजा ने आज्ञा दी— जाओ इसे सूली पर चढ़ा दो । वे उसकी बाहो को पीछे बांध बध्य-भेरी के बजते हुए उसे नगर से बाहर ले गए और वहाँ सूली पर चढ़ा दिया । बड़ी वेदना हुई । कौवे सिर पर बैठ कर बर्छी की नोक सदृश चोंच से उसकी आँखें निकालने लगे । वैसे कष्ट को भी भूलकर वह यही सोचता रहा—'ओह ! मैं घने पुष्प के रंग से रंगे वस्त्र पहने, गले मे दोनो हाथ डाले उस स्त्री के साथ कार्तिक रात्रि के उत्सव में न घूम सका ।" इस प्रकार चिन्ता करते हुए यह गाथा कही— नयिदं दुक्खं अदु दुक्खं यं मं तुदति वायसो, यं सामा पुप्फरत्तेन कत्तिकं नानुभोस्सति ॥ [ न मैं इसे ही दुःख समझता हूँ, न उसे ही जो कि कौआ मुझे ठोगे मारता है । मुझे दुःख है तो यह है कि मेरी श्यामा फूल के रंगे वस्त्र से कार्तिक के उत्सव का आनन्द न ले सकेगी । ] नयिद दुक्खं अदु दुक्खं य मं तुदति वायसो, यह जो सूली पर चढ़ने का शारीरिक और मानसिक दुःख है और यह जो लोहे जैसी चोंच से कौआ मुझे ठोगे मारता है, यह सब मेरे लिए दुःख नहीं है । केवल वही दुःख मेरे लिए दुःख है । कौनसा ? यं सामा पुप्फ रत्तेन कत्तिक नानुभोस्सति, जो वह प्रियङ्गु श्यामा मेरी भार्य्या एक केसरी वस्त्र पहन, एक ओढ, इस प्रकार घने रंगीन लाल वस्त्र जोड़े को धारण कर मुझे गल लगा कार्तिक रात्रि के उत्सव का आनन्द न ले सकेगी । यही मेरा दुःख है । यही मुझे कष्ट देता है । यह इस प्रकार उस स्त्री के बारे में विलाप करता हुआ ही मरकर नरक में पैदा हुआ । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय के पति पत्नी इस समय के पति-पत्नी । उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला आकाश- देवता मै ही था ।