भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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[ २२ ] विषय पृष्ठ २२६ कोसिय जातक ३८८ [ समय पर घर से बाहर निकलना अच्छा है, असमय पर नहीं । ] २२७ गूहपाणक जातक ३६१ [ गूँह का कीड़ा गीले गूँह पर चढ़ा । वह उसके चढ़ने से थोड़ा नीचे को दबा । गूँह का कीड़ा चिल्लाया— पृथ्वी मेरा बोझ नहीं उठा सकती है । ] २२८ कामनीत जातक ३६४ [ काम जातक (४६७) म । ब्रह्मचारी न राजा को तीन राज्य जिला देन की बात कही । फिर वह चला गया । राजा को लगा कि उसके हाथ में आए हुए तीन राज्य चले गए । ] २२६ पलासी जातक ३६८ [ वाराणसी नरेश ने तक्षशिला पर आक्रमण की तैयारी की । किन्तु वह तक्षशिला नरेश की ड्योढ़ी देखकर ही हिम्मत हार गया । ] २३० द्वितिय पलासी जातक ४०१ [ तक्षशिला नरेश न वाराणसी नरेश पर आक्रमण की तैयारी की । किन्तु वह वाराणसी नरेश के स्वर्णपट सदृश महाललाट को देख कर हिम्मत हार गया । ] ६. उपाहन वर्ग ४०५ २३१ उपाहन जातक ४०५ [ शिष्य ने आचार्य से हस्ति शिल्प सीख उसी से मुकाबला करना चाहा । ] २३२ वीणथूण जातक ४०८ [ सेठ की लडकी न कुबडे की पीठ पर कूब देख कर समझा यह पुरुषों म वृषभ होगा । ]