जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० [ २१ १५६ नही लेकर दिया था ? अब इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित होकर क्यो हिम्मत हारता है ?" इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी के समीप ही बढ़ई-ग्राम था । वहाँ पाँच सौ बढ़ई रहते थे । यह नौका से नदी के स्रोत के ऊपर की तरफ जाते । यहाँ जगल में घर बनाने की लकडी पाटकर वही एक तल्ले तथा दो तल्ले के मकान बना, खम्भे से आरम्भ करके सभी लकडियो पर चिह्न लगाते । फिर उन्हें नदी के किनारे ले जा, नौका पर चढा, स्रोत के अनुसार चल नगर में आते । वहाँ जो जैसे घर चाहता, उसे वैसे बना देकर कार्षापण ले फिर वैसे ही जा घर के सामान लाते । उनके इस प्रकार जीविका चलाते हुए एक बार पडाव डालकर लकडी काटते समय, उनके पास ही एक हाथी का पांव खैर की लकडी के खूंटे पर पडा । उस खूंटे से उसका पांव बिध कर उसमें बडी पीडा होने लगी । पैर सूज गया । उसमें से पीप बहने लगा । पीडा से पीडित हो उसने लकडी काटने का शब्द सुनकर सोचा कि इन बढ़इयो से मेरा कल्याण होगा । ऐसा समझ कर वह तीन पैरो से चलकर उनके पास पहुँचा और वही नजदीक ही पड रहा । बढइयो ने उसका सूजा हुआ पैर देखा तो पास गए । उन्हें उसमें खूंटा दिखाई दिया । उन्होने तेज कुल्हाडी से खूंटे के चारो ओर गहरा निशान कर, उसमें रस्सी बाँधकर उसे खींचकर निकाला। फिर पीप निचोडकर, निकालकर गर्म पानी से धोया। उसके अनुकूल दवाई करने से थोडे ही समय में घाव ठीक हो गया। हाथी ने निरोग होकर सोचा—इन बढइयो ने मेरी जान बचाई । मुझे इनकी कुछ सेवा करनी चाहिए । उस दिन से वह बढइयो के साथ वृक्ष लाने लगा । छीलने के समय वह उन्हे उलट उलट कर सामने करता । कुल्हाडी आदि औजार ले आता । सूण्ड से लपेटकर काले धागे के सिरे को पकड लता । बढई भी भोजन के समय इसे एक एक पिण्ड देते तो पाँच सौ पिण्ड हो जाते । उस हाथी का एक बच्चा था, जो एक दम श्वेत वर्ण का था और था मगल हाथी । हाथी ने सोचा कि मै बूढा हो गया । अब मुझे अपने लडके को इन बढइयो