भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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१६४ [ २-१-१५६ उस समय से सारे जम्बू द्वीप का राज्य एक प्रकार से बोधिसत्त्व के ही हाथ में आ गया। कोई भी शत्रु विरोध न कर सका। सात वर्ष की अवस्था होने पर बोधिसत्त्व का अभिषेक हुआ। वह अलीन चित्त राजा के नाम से धर्मानुकूल राज्य करते रह कर मरने पर स्वर्ग सिधारा। शास्ता ने यह पूर्व जन्म की कथा ला सम्यक् सम्बुद्ध होने की अवस्था में यह दो गाथाएँ कही-- अलीनचित्तं निस्साय पहट्ठा महतो चमू कोसलं सेना-सन्तुट्ठं जीवगाहं अग्राहयी एवं निस्सयसम्पन्नो भिक्खु आरद्धवीरियो भावयं कुसलं धम्मं योगक्खेमस्स पत्तिया पापुणे अनुपुब्बेन सब्ब संयोजनक्खयं ॥ [अलीन चित्त के कारण बड़ी सेना प्रसन्न हुई। अपने राज्य से असन्तुष्ट कोशल नरेश को जिन्दा पकड़वा लिया। इसी प्रकार यदि भिक्षु प्रयत्न-शील हो और उसका सहायक हो तो वह निर्वाण-प्राप्ति के लिए कुशल-धर्मों का अभ्यास कर क्रम से संम्योजनों का क्षय कर सकता है।] अलीनचित्तं निस्साय, अलीनचित्त राजकुमार के कारण पहट्ठा महती चमू, हम लोगो को राज्य-परम्परा देखनी मिली, इसलिए बड़ी सेना प्रसन्न हुई। कोसलं सेनासन्तुट्ठं, कोशल नरेश को, जो अपने राज्य से असन्तुष्ट हो पराया राज्य लेने को आया। जीवगाहं अग़ाहयी बिना मारे ही उस सेना ने उस हाथी से राजा को जीवित पकड़वाया। एवं निस्सय सम्पन्नो जैसे यह सेना उसी प्रकार कोई कुल-पुत्र बुद्ध अथवा बुद्ध-श्रावक सदृश किसी हितैषी को या उसके आश्रय से युक्त। भिक्खु, जो शुद्ध है, उसी का यह नाम है। आरद्धवीरियो, प्रयत्न-शील; चार प्रकार के दोषों से रहित प्रयत्न से युक्त। भावयं कुसलं धम्मं, कुशल, निर्दोष सैंतीस बोधि-पाक्षिक धर्मों की भावना करता हुआ। योगक्खेमस्स पत्तिया चारो प्रकार के योग से क्षेम अथवा निर्वाण की प्राप्ति के लिए उस धर्म का अभ्यास करते हुए। पापुणे अनुपुब्बेन सब्ब संयोजन क्खयं इस प्रकार विपश्यना से इस कुशल-धर्म का अभ्यास करते हुए वह किसी हितैषी का आश्रय-प्राप्त भिक्षु क्रम से विपश्यना ज्ञान और पहले मार्ग-ज्ञान