भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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गुण ] १७१ इस लिए यदि हमारा रहना अच्छा न लगता हो, तो हमें सीधा निकाल दे। कष्ट देने से क्या लाभ ? —यही अर्थ प्रकट करने के लिए यह कहा। मिगो, सिंह को सम्बोधन करता है। वह मृगराज होने से मृगो का मालिक है, इसी लिए मिगी। उन्नदन्ति—यह भी उसी का सम्बोधन है। ऊँचे दांतो वाला होने से उन्नदन्ति। उन्नतदन्ति, यह भी पाठ है। विजानाहि, यही ऐश्वर्य- शालियो का स्वभाव है, यह जान लें। जात सरणतो भय, हमें तुमसे प्रतिष्ठा मिली, इससे तुम्ही हमारे शरण। अब तुम्हारे ही पास से भय पैदा हो गया। इस लिए हम अपने निवास-स्थान को जायेंगे। दूसरा अर्थ—मिगी (सिंहनी) उन्नदन्ती मेरे बच्चो और स्त्री को ताडती है। येन काम पणमेति, जिस जिस तरह से चाहता है उस उस तरह से निकाल देता है, प्रर्वतित करता है तग करता है—इसे तू जान ले। इसमे हम क्या कर सकते हैं ? धम्मो बलवत, यह बलवानो का स्वभाव है। हम जाते हैं। किस लिए ? क्योकि जात सरणतो भय । उसकी बात सुनकर सिंह ने सिंहनी से पूछा—"भद्रे ! अमुक समय मे शिकार के लिए गया था और सातवें दिन इस सियार और सियारनी के साथ लोटा था, इसकी कुछ याद है ?" "हाँ, याद है।" 'मेरे एक सप्ताह तक न आ सकने का कारण जानती है।" "स्वामी ! नही जानती हूँ।" 'भद्रे ! मैं एक मृग को पकडने जाकर चूक कर दलदल में फँस गया। उसमें से न निकल सकने के कारण सप्ताह भर भूखा खडा रहा। अरे, इस सियार ने मेरे प्राण बचाए। यह मुझे जीवन-दान देने वाला मित्र है। जो मित्र का धर्म पूरा कर सके वह मित्र दुर्बल नही माना जाता। इस के बाद मेरे मित्र, मेरी सखी तथा उसके बच्चो का इस प्रकार अपमान न करना।" इतना कह सिंह ने दूसरी गाथा कही— अपिचेपि दुब्बलो मित्तो मित्तधम्मेसु तिट्ठति सो जातको च बन्धू च सो मित्तो सो च मे सखा, दाठिनि ! मातिमिन्र्ञत्थो सिगालो मम पाणदो ॥