भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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१६४ [ २.२.१६३ सोने की ध्वजाओं के साथ सुनहरी जालों से ढक कर खड़ा किया गया । राजा- ङ्गण अलङ्कृत हुआ । ब्राह्मण लोग प्रसन्नचित्त सजधज कर खड़े थे कि हम हस्ती-मङ्गल वरेंगे, हम करेंगे । सुसीम राजा भी गहने और भाण्डे लिवा जाकर मङ्गल-स्थान पर खड़ा हुआ । बोधिसत्त्व ने भी एक कुमार के लिए जिस ढंग से अलङ्कृत होना उचित है, उस तरह अलङ्कृत हो, अपनी परिषद का नेता बन राजा के पास जाकर पूछा—"महाराज ! क्या आपने सचमुच ऐसी बात कही है कि हमारे यश को नाश करके, दूसरे ब्राह्मणों से हस्ती-मङ्गल करवा, हाथियों के अलङ्कार तथा दूसरे सामान उनको देंगे ?" इतना कह, पहली गाथा कही— काळा मिगा सेतदन्ता तव इमे परोसतं हेमजालाभिसञ्छन्ना ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि अनुस्सरं पेत्तिपितामहानं ॥ [ सुसीम ! क्या तुम अपने और हमारे पूर्वजों को याद करके भी यह कहते हो कि सोने के जाल से ढके हुए सौ से अधिक काले हाथी, जिनके दांत सफ़ेद हैं, तुमको देंगे, तुमको देंगे ? ] ते ते ददामीति सुसीम ! ब्रूसि, वंह यह अथवा तुम्हारे पास के, काळा मिगा सेत दन्ता, ऐसे नाम वाले सौ से अधिक सब अलङ्कारों से सजे हाथी दूसरे ब्राह्मणों को देता हूँ, हे सुसीम ! क्या तू यह सचमुच कहता है । अनुस्सरं पेत्ति पितामहानं, हमारे और अपने यश के पिता-पितामह आदि को याद करते हुए । महाराज ! सात पीढ़ियों से हमारे पिता-पितामह हस्ती-मङ्गल करते रहे हैं । सो आप इसे याद करके भी क्या सचमुच हमारे और अपने वंश (के सम्बन्ध) को नष्ट करके ऐसा कहते हैं ? सुसीम ने बोधिसत्त्व की बात सुन दूसरी गाथा कही— काळा मिगा सेतदन्ता मम इमे परोसतं हेमजालाभि सञ्छन्ना