भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

उपसाळ्हक ] २०३ उस समय बोधिसत्व मगध देश में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, सब विद्याएँ सीख, ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कर ध्यान-क्रीडा करते हुए हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे । फिर नमक- खटाई खाने के लिए गृध्रकूट पर पर्ण-कुटी में रहने लगे । उस समय उस ब्राह्मण ने इसी तरह से पुत्र को कह, पुत्र के यह कहने पर • कि 'तुम्ही मुझे उस तरह का स्थान बता दो' यही स्थान बताया । फिर पत्र के साथ उतरते हुए ब्राह्मण बोधिसत्त्व को देख उनके पास पहुँचा । बोधिसत्त्व ने इसी तरह पूछ माणवक की बात सुन, कहा—'आ, तेरे पिता द्वारा बताए गए स्थान की परीक्षा करें कि वहाँ पहले कोई जलाया गया है, वा नहीं ?' फिर उनके साथ पर्वत-शिखर पर चढ़, जब माणवक ने कहा कि यह तीनो चोटियो के बीच का स्थान ऐसा है जहाँ कोई नहीं जलाया गया, कहा—"माणवक ! इसी स्थान पर जलाए गयो का हिसाब नहीं है। तेरा पिता इसी राजगृह में ब्राह्मण कुल में ही पैदा होकर, उपसाळ्हक नाम से ही इन्ही चोटियो के बीच में चौदह हजार बार जलाया गया है। पृथ्वी में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ कोई न कोई जलाया न गया हो, जहाँ श्मशान न बना हो, जहाँ सिर न कटे हो। पूर्व-जन्मो का ज्ञान होने से, उघाड कर यह दो गाथाएँ कही— उपसाळ्हक नामान सहस्सानि चतुद्दस अस्मिं पदेसे दट्ठानि नत्थि लोके अनामंतं ॥ यम्हि सच्चं च धम्मो च अहिंसा सयमो दमो एतदरिया सेवन्ति एतं लोके अनामंतं । [ उपसाळ्हक नाम से ही चौदह हजार व्यक्ति इसी स्थान में जलाए गए। लोक में ऐसी जगह नहीं है जहाँ कोई न कोई मरा न हो। जिसमे सत्य है, धर्म है, अहिंसा है, सयम है उसे आर्य्य-जन सेवन करते हैं। यही लोक में नहीं मरता है ।] ——— अनामंतं, मृत-स्थान को ही व्यवहार से अमृत-स्थान कहा गया है। उसका प्रतिषेध करते हुए अनामंत कहा है। अनमतं, भी पाठ है। लोक में