जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसमिद्धि ] २०५ पहन लिया था और उत्तरासंग उनके हाथ में था। वे सोने की सुन्दर प्रतिमा की तरह प्रतीत होते थे। उनका शरीर समृद्ध होने से ही उनका नाम समिद्धि था। उनके शरीर का सौन्दर्य देख एक देव-कन्या उन पर आसक्त हो गई और बोली—"भिक्षु ! तू तरुण है, तू युवा है, तेरे केश सुन्दर तथा काले है, तू श्रेष्ठ यौवन से युक्त हैं, तू मनोरम है, तू दर्शनीय है, तू मन को प्रसन्न करने वाला हैं। तेरे ऐसे शरीर वाले को काम-भोगो को न भोग प्रव्रजित होने में क्या लाभ ? अभी तू काम-भोगो को भोग। पीछे प्रव्रजित होकर श्रमण-धर्म का पालन करना।" उसे स्थविर ने उत्तर दिया—"हे देव-कन्या ! मैं नही जानता कि मैं किस आयु में मरूँगा। मेरी मृत्यु मुझसे छिपी है। इसलिए तरुणाई की अवस्था में ही श्रमण-धर्म करके दुःख का अन्त करूँगा।" स्थविर ने उसका स्वागत नही किया। वह वही अन्तर्ध्यान हो गई। स्थविर ने शास्ता के पास जाकर यह बात कही। शास्ता बोले— "समिद्धि ! न केवल तुझे ही अब देव-कन्या ने प्रलोभित किया है ? पूर्व में भी देव-कन्याओ ने प्रव्रजितों को प्रलोभित किया है।" शास्ता ने उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी-गाँव में ब्राह्मण कुल में पैदा हो, बडे होने पर सब विद्याओ में पारङ्गत हो, ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय प्रदेश में एक तालाब के पास रहने लगे। वह सारी रात योगाभ्यास करते रहे। अरुणोदय होने पर स्नान किया। फिर एक वल्कल चीर पहन, एक हाथ में ले शरीर को सुखाने लगे। उसका सुन्दर शरीर देख एक देव-कन्या उस पर आसक्त हो बोधिसत्व को ललचाती हुई यह पहली गाथा बोली—