जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
DevanagariHindipublished479 पृष्ठ
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[२०८] [ २.२.१६८
क. वर्तमान कथा एक दिन शास्ता ने भिक्षुओं को सम्बोधन कर उपदेश दिया "भिक्षुओ ! जो तुम्हारे योग्य हो उसमें विचरो। जो तुम्हारा पैतृक विषय हो उसमें।" यह संयुक्त निकाय के महावर्ग का सूत्र है।' इसका उपदेश करते हुए कहा- "तुम अपनी बात रहने दो। पूर्व समय में जानवर भी अपने पैतृक विषय को छोड़ अयोग्य-स्थान में विचरने से शत्रुओं के हाथ में पड़, अपनी बुद्धि तथा उपाय-कौशल से शत्रुओं के हाथ से मुक्त हुए।" इतना कह शास्ता ने पूर्व- जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व बटेर होकर पैदा हुआ। वह हल चलाने की जगह पर ढेलों में रहता था। एक दिन अपनी गोचर-भूमि को छोड़ दूसरे की गोचर भूमि में जाने की इच्छा से वह जंगल तक चला गया। उसे वहाँ घूमता देख एक बाज ने यकायक आकर पकड़ लिया। जब उसे बाज पकड़ कर ले जा रहा था, तो वह इस प्रकार रोने लगा- "हम अत्यन्त अभाग्यवान् हैं। हमारा पुण्य बहुत कम है। हम दूसरों के स्थान में चरने गए। यदि आज हम अपने पैतृक स्थान में ही चरते तो यह बाज मेरे साथ युद्ध करने में समर्थ न होता"। "लापक ! तेरा स्वकीय पैतृक स्थान कौन सा है ?" "यही जहाँ हल चलाने की जगह पर ढेले हैं।" बाज ने अपने दल को ढीला कर उसे छोड़ दिया और कहा- 'ह बटेर तू जा। मैं तुझे वहाँ भी जाकर पकड़ लूँगा।' बटेर ने वहाँ जा एक बड़े से ढेले पर चढ बाज को ललकारा- 'बाज ! अब तू आ।' बाज ने अपना बल सँभाल, दो पक्षों को उठा बटेर को एकदम घेर लिया।
१ सतिपट्ठान सयुत्त, अम्बपालि वर्ग ।