भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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भावना करने से, को बढ़ाने से, को जारी रखने से, का अभ्यास करने से, का अनुष्ठान करने से, का अच्छी तरह आरम्भ करने से ग्यारह लाभो की आशा करनी चाहिए। कौन से ग्यारह ? सुख पूर्वक सोता है, सुख से जागता है, बुरा स्वप्न नही देखता, मनुष्यो का प्रिय होता है, अ-मनुष्यों का प्रिय होता है, देवता रक्षा करते हैं, इस पर अग्नि, विष, या शस्त्र का आक्रमण नही होता, चित्त जल्दी शान्त हो जाता है, मुख-वर्ण सुन्दर होता है, होश रखकर शरीर छोड़ता है तथा अधिक कुछ (निर्वाण-मार्ग) न प्राप्त कर सकने पर ब्रह्मलोकगामी अवश्य होता है। भिक्षुओ मैत्री भावना जो कि चित्त की विमुक्ति (का साधन) है, का सेवन करने से.. .इन ग्यारह लाभो की आशा करनी चाहिए।" इन ग्यारह लाभो वाली मैत्री-भावना की प्रशंसा कर आगे कहा—"भिक्षुओ, भिक्षु को सभी प्राणियो के प्रति खास तौर पर, साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी चाहिए। हितैषी का भी हित- चिन्तक होना चाहिए, जो हितैषी न हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए, जो मध्यस्थ-वृत्ति हो उसका भी हित-चिन्तक होना चाहिए। इस प्रकार सभी प्राणियो के प्रति खास तौर पर, तथा साधारण तौर पर मैत्री-भावना करनी चाहिए । करुणा-भावना की भावना करनी चाहिए । मुदिता-भावना की भावना करनी चाहिए। उपेक्षा-भावना की भावना करनी चाहिए। इन चारो ब्रह्म-विहारो का अभ्यास करना ही चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करने से यदि मार्ग तथा फल की प्राप्ति न भी हो तो भी ब्रह्मलोकगामी होता है । पुराने समय में भी पण्डित लोग सात वर्ष तक मैत्री-भावना करके सात सबत- विवर्त्त कल्प तक ब्रह्मलोक में ही रहे।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा

पूर्व समय में एक कल्प में बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए । बड़े होने पर काम-भोगो को छोड़ ऋषि-प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो चारो ब्रह्म-विहारो को प्राप्त कर अरक नाम से उपदेशक हुए। वह हिमालय प्रदेश में रहते थे। उनके बहुत अनुयाई थे। वे ऋषि-गणो को उपदेश देते हुए कहते —"प्रव्रजित को मैत्री-भावना का अभ्यास करना चाहिए। करुणा-भावना,