जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१६ [ २३।७१ ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणशी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व एक सेठ के घर में पैदा हुए। बड़े होने पर पिता के मरने के बाद सेठ का पद मिला। वह एक दिन घर से निकल राजा की सेवा में पहुॅचा। उसकी सास अपनी लड़की को देखने की इच्छा से उसके घर आई। वह थोड़ी बहरी थी। आगे की सब कथा 'वर्तमान-कथा' सदृश ही है। उसे राजा की सेवा करके अपने घर लौटते समय एक आदमी ने देख कर कहा—'तुम्हारे घर पर सब लोग रो पीट रहे हैं कि तुम प्रव्रजित हो गए।' बोधिसत्त्व ने सोचा कि जो प्रशंसा होने लगी है, उस शुभ-नाम को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। वह वहीं से लौट कर राजा के पास पहुँचे। राजा ने पूछा— "महासेठ ! अभी जाकर अभी फिर क्या लौट आए ?" "देव ! घर के लोग मुझ अप्रव्रजित को ही प्रव्रजित हुआ समझ कर रोते पीटते हैं। यह जो मुझे शुभ-नाम मिला है, इसको लुप्त होने देना ठीक नहीं। मैं प्रव्रजित होऊँगा। मुझे प्रव्रजित होने की आज्ञा दें।" सेठ ने इस भाव को प्रकट करने वाली दो गाथाएँ कहीं— कल्याणधम्मोति यदा जनिन्द लोके समञ्ञा अनुपापुणाति, तस्मा न हीयेय नरो सपञ्जो हिरियापि सन्तो धुरमादियन्ति ॥ सायं समञ्ञा इध मञ्ज पत्ता कल्याणधम्मोति जनिन्द लोके, ताहं समेक्ख इध पब्बजिस्स नहि मत्थि छन्दो इध कामभोगे ॥ [ हे राजन् ! जब लोक में किसी की कीर्ति होती है, उसे शुभ-नाम मिलता है, तो बुद्धिमान् आदमी को उसे छोड़ना नहीं चाहिए। श्रेष्ठ पुरुष लज्जा से भी (प्रव्रज्या ) धुर को प्राप्त करते हैं।