जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० [ २.३.१७३ उसकी बात सुन पिता ने दूसरी गाथा कही— अधमो मिगजातानं सिगालो तात वस्सति जातिमस्स जिगुच्छन्ता तुण्ही सीहा समच्छरे ॥ [तात ! पशुओ में जो सबसे नीच शियार है वही चिल्लाता है। सिंह उसकी जाति से घृणा करने के कारण चुप हो गए हैं।] समच्छरे, सं केवल उपसर्ग है । अच्छा समझते हैं अर्थ है । तुण्ही, बैठते हैं, चुप होकर बैठते हैं, यही अर्थ है । पुस्तको में समच्छरे लिखते हैं। शास्ता बोले—"भिक्षुओ ! कोकालिक ने केवल अभी अपनी वाणी से अपने को प्रकट नहीं किया, पहले भी किया ही है।" यह धर्म-देशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया । उस समय सियार कोकालिक था। सिंह-बच्चा राहुल । सिंह-राज मैं ही था। १७३. मक्कट जातक "तात ! माणवको एसो..." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोंगी के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह कथा प्रकीर्णक परिच्छेद की उद्दालक जातक' मे आएगी । उस 'उद्दालक जातक (४८७)