जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदरारे पानी से भरी हैं। मार्ग दुर्गम है। मैं शास्ता के पास जाता हूँ। वे मुझे पूछेंगे, 'महाराज ! कहाँ जाते हो ?' मैं उन्हें यह बात कहूँगा। शास्ता मुझे केवल पारलौकिक उपदेश ही नहीं देते हैं। वह मुझे इस लोक में भी लाभ की बात बताते हैं। इसलिए यदि जाने से मेरी हानि होती होगी तो वह कह देंगे, 'महाराज ! यह असमय है।' यदि लाभ होगा, तो वह चुप रहेंगे। वह जेतवन जा शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा--महाराज ! दिन चढ़े तुम कैसे आए ? भन्ते ! मैं इलाके को शान्त करने के लिए निकला हूँ। तुम्हें प्रणाम करके जाने की इच्छा से आया हूँ। शास्ता न कहा--'महाराज ! पूर्व समय में भी सेना के तैयार होने पर, पण्डितो का कहना मान राजा लोग असमय में सेना को चढ़ा कर नहीं ले गए।' फिर उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसके अर्थ-धर्मानुशासक सर्वार्थ-अमात्य थे। राजा के इलाके के बगावत करने पर प्रत्यन्त के योद्धाओ ने सन्देशा भेजा ! राजा वर्षा ऋतु में निकला। उसका पड़ाव उद्यान में लगा। बोधिसत्त्व राजा के पास खड़े थे। उस समय घोडो के लिए मटर भिगो, ला कर द्रोणियो में डाल रहे थे। उद्यान के बन्दरो में से एक बन्दर वृक्ष से उतरा। उसने वहाँ से मटर लिए, मुँह भरा, हाथ भी भरे और कूद कर वृक्ष पर चढ़ खाना शुरू किया। खाते समय उसके हाथ से एक मटर भूमि पर गिर पड़ा। वह हाथ में और मुंह में जितने मटर थे उन्हें छोड़ वृक्ष से उतर उस मटर को ढूंढने लगा। जब उसे वह मटर नहीं दिखाई दिया तो वह फिर वृक्ष पर चढा और वहां जुए मे हजार हार गए की तरह चिन्ता करता हुआ रोनी शकल बना वृक्ष की शाखा पर बैठा। राजा ने बन्दर की करतूत देख बोधिसत्त्व को सम्बोधन कर पूछा— 'मित्र ! बन्दर ने यह क्या किया ?' बोधिसत्त्व ने कहा—'महाराज !