भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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२३२ [ २३.१७७ जाने पर बानरो को देखा तो और आदमियो को खबर दी। बहुत से आदमी तीर कमान तैयार कर, नाना प्रकार के आयुध ले, ढेले-डण्डे आदि के साथ वृक्ष को घेर कर खड़े हो गए कि रात बीतने पर बानरो को पकड़ेंगे। अस्सी हजार बानरो ने मनुष्यों को देखा तो उन्हें डर लगा कि अब मरे। उन्होंने सोचा कि बानरेश को छोड़ उन्हें और कही शरण न मिलेगी। वे उसके पास गए और पहली गाथा कही— धनुहत्थकलापेहि नेत्तिसवरधारिहि समन्ता परिकिण्णम्हा कथ मोक्खो भविस्सति ॥ [तीर कमान हाथ में लिए तथा उत्तम खड्ग धारण किए हुए आदमियो से हम घिरे हैं। कैसे मुक्त होगे ? ] धनुहत्थकलापेहि, धनुष और (तीर-)समूह जिनके हाथ में हैं, धनुष और तीर-समूह लेकर जो खड़े हैं। नेत्तिसवरधारिहि, नेत्तिस कहते हैं खड्ग को, उत्तम खड्गधारियो से, परिकिण्णम्हा, हम घिरे हुए है, कथ किस उपाय से हमारा मोक्ष होगा। उनकी बात सुन बानरेश ने कहा—'डरो मत ! मनुष्यो को बहुत काम रहते हैं। अभी आधी रात है। यह हमें मारने के लिए खडे हैं। इस (हमारे मारने के) काम में विघ्न करने वाला दूसरा काम पैदा कर दें।' इस प्रकार उन्हें आश्वासन देते हुए दूसरी गाथा कही— अप्पेव बहुकिच्चान अत्थो जायेय कोचि न अथ्थिय रुक्खस्स अच्छेद्दन खज्जतञ्ञेव तिन्दुक ॥ [इन बहुत काम वालो को कोई न कोई काम पैदा हो सकता है। वृक्ष पर अभी फल लगे हैं। तिन्दुक को खाओ।] नं निपातमात्र है। अप्पेव बहुकिच्चान, मनुष्यो को दूसरा कोचि अत्यो उत्पन्न हो सकता है। अथ्थिय रुक्खस्स अच्छेद्दन इन वृक्षो पर से तोडने उतारने