भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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२५४ [ २.४ ।८३ नगर-द्वार पर पहुँचे । पटिक्कमसि किस कारण से पीछे हटता है ? किस कारण से रुकता है ? श्रोमद्द मर्दन कर, नीचे गिरा दे । एसिकानि च अब्बूह, नगर-द्वार पर सोलह हाथ या आठ हाथ भूमि के अन्दर प्रवेश करके स्थिर रूप से गाडे हुए स्तम्भ एसिका-स्तम्भ कहलाते हैं। उन्हें जल्दी उखाड फेकने की आज्ञा देता है। तोरणानि पमद्दित्वा नगर-द्वार के पीछे के चौखट मर्दित कर। खिप्प पविस, जल्दी से नगर में प्रवेश कर। कुञ्जर, नाग को सम्बोधित करता है। - उसे सुन बोधिसत्त्व ने एक ही उपदेश से रुक, स्तम्भो को सूण्ड से लपेट, 'सांप की छतरियों' की तरह उखाड, तोरण का मर्दन कर बाधा को उखाड़ फेंका। फिर नगर-द्वार को तोड, नगर में प्रवेश कर राजा को राज्य ले दिया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय हाथी नन्द था। राजा आनन्द था। हाथी शिक्षक तो मैं ही था। १८३. वाळोदक जातक "वाळोदक अप्परसं विहीनं, ॰" यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय पांच सौ जूठन खाने वालो के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में पाँच सौ श्रावक घर-गृहस्थी का भार अपने स्त्री-बच्चो को सौंप, शास्ता का धर्मोपदेश सुनते हुए एक साथ रहते थे। उनमे कोई स्रोतापन्न थे, कोई सकृदागामी तथा कोई अनागामी, पृथकजन कोई भी नही था। शास्ता को निमन्त्रित करते तो भी वह मिलकर ही निमन्त्रित करते। उनको दातुन, मुख धोने का जल, सुगन्धि तथा माला आदि देने वाले उनके पांच सौ छोटे सेवक जूठन खाकर रहते। वह प्रात काल का भोजन खा,