जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४६ [ २.४.१८३ थाळोदकं अप्परसं निहीनं पीत्वा मदो जायति गद्दभानं इमं च पीत्वान रसं पणीतं मदो न सञ्जायति सिन्धवानं [ गधों को थोड़े से रस वाला, तुच्छ, बोरे से छना हुआ पानी पीकर भी मद हो जाता है। सैन्धव घोड़ों को यह श्रेष्ठ रस पीकर भी मद नहीं होता।] वालोदकं बोरे से छाना हुआ पानी, घालूदकं भी पाठ है। निहीनं हीन रस से युक्त, न सञ्जायति, सैन्धव घोड़ो को मद नहीं होता है, क्या कारण है ? इसका कारण कहते हुए बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही— अप्पं पिवित्वान निहीनजच्चो सो मज्जति तेन ऽजनिन्द फुट्ठो धोरय्हसीलो च कुलम्हि जातो न मज्जति अग्गरसं पिवित्वा [ राजन् ! हीन कुल में पैदा हुआ, थोड़ी भी पी लेने से उसके स्पर्श से (ही) मस्त हो जाता है। स्थिर शील वाला तथा श्रेष्ठ कुल में पैदा हुआ, श्रेष्ठ रस पीकर भी मस्त नहीं होता।] • तेन जनिन्द, फुट्ठो, जनेन्द्र ! श्रेष्ठ राजन् ! वह हीन कुल में पैदा हुआ, अपने कुल की हीनता के कारण मज्जति, प्रमाद को प्राप्त होता है, धोरय्हसीलो स्थिर रूप से वहन करने की योग्यता वाला सैन्धव जाति का घोड़ा, अग्गरसं सबसे पहले लिया हुआ अंगूर-रस, पिवित्वा न मज्जति। राजा ने बोधिसत्त्व की बात सुन गधों को राजाङ्गण से निकलवाया। फिर उसी के उपदेशानुसार चल दानादि पुण्यकर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक सिधारे।