जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ [ २.४.१८४ हुए) जाने से घोडे ने सोचा कि यह मुझे सिखाना चाहता है। उसके अनुसार चलने से वह लँगडा हो गया। उसके लँगडेपन की बात राजा तक पहुँचाई गई। राजा ने वैद्यों को भेजा। उन्होंने जब देखा कि घोडे को कोई बीमारी नहीं हैं, तो उन्होंने राजा से कहा कि घोडे के शरीर में कोई रोग तो नहीं दिखाई देता। राजा ने बोधिसत्व को भेजा “मित्र ! जा, क्या कारण है, पता लगा।” उसने जाकर शिक्षक के लँगडे होने के कारण ही यह लँगडा हुआ है जान, राजा को सूचना दी, और यह दिखाने के लिए कि खराब सगत से ऐसा हो जाता है, यह गाथा कही— दूसितो गिरिदत्तेन हयो सामस्स पण्डवो पोराणं पर्कति हित्वा तस्सेव अनुविधीयति ॥ [ राजा साम के पण्डव घोडे को गिरिदत्त ने खराब कर दिया। वह अपने पहले स्वभाव को छोड कर उसीका अनुकरण करता है। ] हयो सामस्स सामराजा का मङ्गल घोडा, पोराण पर्कति हित्वा अपनी पुरानी प्रकृति, शृङ्गार छोड कर, अनुविधीयति अनुसार सीखता है। तब राजा ने पूछा—"मित्र ! अब क्या करना चाहिए ?" बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—अच्छा शिक्षक मिलने से फिर पहले की तरह हो जाएगा। और यह दूसरी गाथा कही— सचेव तनुजो पोसो सिखराकारकप्पितो, आनने त गहेत्वान मण्डले परिवत्तये, खिप्पमेव पहत्वान तस्सेव अनुविधीयति ॥ [ यदि सुन्दर आकार-प्रकार वाला, उस घोडे के अनुरूप शिक्षक उसे मुंह से पकड कर घुमाएगा, तो वह जल्दी ही यह (लँगडापन) छोड कर उसका अनुकरण करेगा। ]